
पेट्रोल की कीमतों में यह कमी केवल राजनीतिक कारणों से की गयी है, इसके पीछे कोई अर्थशास्त्र नहीं है।
जब पेट्रोल की कीमत 3 नवंबर को 1.82 रुपये प्रति लीटर बढ़ायी गयी थी, उस समय भी वह बढ़ोतरी पेट्रोल पर घाटे की वजह से नहीं, बल्कि डीजल पर घाटे की भरपाई के लिए की गयी थी। उस समय सरकार ने इस बढ़ोतरी के लिए इजाजत दे दी, लेकिन बाद में सरकार को लगा कि विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। साथ ही संसद की बैठक शुरू होने वाली है, जिसमें विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है। सरकार ने जनमत अपने खिलाफ जाते देख कर पेट्रोल की कीमतों में कमी का यह फैसला किया। हालाँकि सरकार को पता है कि रसोई गैस (एलपीजी) और डीजल पर अभी तेल कंपनियों को प्रति लीटर काफी नुकसान सहना पड़ रहा है। लेकिन सरकार ने शायद यह सोचा है कि कच्चे तेल के दाम यहाँ से और ज्यादा नहीं बढ़ेंगे। दूसरे, सरकार को शायद उम्मीद है कि इरान के बारे में राजनयिक स्थितियाँ बेकाबू नहीं होंगी। अगर इन दोनों मोर्चों पर अगले 3-4 महीनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो तो सरकार को ज्यादा परेशानी नहीं होगी। हालाँकि आगे चल कर शायद रसोई गैस के दाम अधिक खपत वाले उपभोक्ताओं के लिए बढ़ाये जायेंगे। सरकार के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। फिलहाल सरकार ने पेट्रोल के दाम घटा कर कुछ समय के लिए शांति खरीदी है और जो पेट्रोल बम बनता दिख रहा था, उसे निष्क्रिय करने की कोशिश की है। दरअसल सरकार का यह भ्रम टूटा है कि पेट्रोल की खपत धनाढ्य वर्ग करता है। पेट्रोल की खपत करने वालों में छात्रों से लेकर एक बैंक का आम कर्मचारी तक शामिल है। पेट्रोल के दाम बढ़ाने का जमीनी स्तर पर जो विरोध दिखने लगा था, सरकार उसके लिए तैयार नहीं थी। नरेंद्र तनेजा, ऊर्जा विशेषज्ञ (Narendra Taneja, Energy Expert) (शेयर मंथन, 16 नवंबर 2011) |
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Last Updated ( Wednesday, 16 November 2011 11:38 )
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