नरेंद्र तनेजा, ऊर्जा विशेषज्ञ
किरीट पारिख समिति की रिपोर्ट ने तेल क्षेत्र में सुधारों की जरूरत को सामने रखा है और यह सरकार को एक दिशा दिखा सकती है, लेकिन शायद सरकार इस रिपोर्ट के 10% सुझावों पर भी अमल करने की स्थिति में नहीं है।
पारिख समिति के सुझाव अभी माने जायें या नहीं, लेकिन पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतें जरूर बढ़ जायेंगी। इस रिपोर्ट ने कीमतें बढ़ाने की भूमिका तो तैयार कर ही दी है। रिपोर्ट पर अमल करने के लिए समय अनुकूल नहीं है। अभी किसी भी दल का राजनीतिक माहौल पेट्रोलियम क्षेत्र में बड़े स्तर पर सुधार के लिए तैयार नहीं है। अगर सरकार इस पर अमल करना चाहे तो भी इसे 3 दिक्कतें आयेंगी। पहली बात यह कि इसके लिए जरूरी नियमन प्रक्रिया (रेगुलेटरी मेकेनिज्म) तैयार नहीं है। दूसरे, सरकारी कंपनियों को कीमतें तय करने की आजादी मिल गयी, तो भी वे इस छूट का प्रयोग करने के लिए मानसिक, प्रशासनिक और प्रबंधकीय रूप से तैयार नहीं हैं। इन कंपनियों का शीर्ष प्रबंधन अपनी पूरी जिंदगी सरकारी आदेश पर चलता रहा है। उनकी सोच अचानक नहीं पदल पायेगी। उन्हें स्वायत्तता की आदत नहीं है। उन्हें अपना फैसला गलत होने पर या वह फैसला सरकार के किसी हिस्से को पसंद नहीं आने पर सीवीसी, सीबीआई और आरटीआई वगैरह के डर लगे रहेंगे। इसलिए लोग बड़े फैसले करने का जोखिम नहीं लेंगे। तीसरे, सब्सिडी और क्रॉस सब्सिडी का फॉर्मूला सरकारी दखल के बिना लागू कर पाना बड़ा मुश्किल होगा। (शेयर मंथन, 04 फरवरी 2010) |
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Last Updated ( Thursday, 04 February 2010 09:06 )
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