Home जानकारों की राय निर्मल जैन Nirmal Jain अब सरकारी घाटे पर नियंत्रण सबसे जरूरी
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अब सरकारी घाटे पर नियंत्रण सबसे जरूरी Print E-mail

निर्मल जैन, चेयरमैन, इंडिया इन्फोलाइन

वित्त मंत्री मौजूदा यूपीए सरकार का दूसरा बजट पेश करने वाले हैं।

जिस पृष्ठभूमि में यह बजट लाया जा रहा है, वह स्पष्ट रूप से पिछले बजट से अलग है। पिछले साल जून में जब वित्त मंत्री ने अपना बजट पेश किया था, उस समय विश्व काफी गंभीर मंदी के दौर से गुजर रहा था। उस समय भारत में भी आर्थिक गतिविधियों में काफी धीमापन दिख रहा था। निर्यात में गिरावट आ रही थी और लोगों में आत्मविश्वास कम था।
अब 9 महीनों के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर हुई है और धीरे-धीरे बेहतर होती दिख रही है। भारत में भी आर्थिक विकास दर और तेज हुई है। कारोबारी साल 2009-10 में सूखे के बावजूद आर्थिक विकास दर पिछले कारोबारी साल से अधिक होगी। निर्यात की स्थिति सँभलने के संकेत दिख रहे हैं। पूँजी का निवेश फिर शुरू हो गया है और व्यापार-क्षेत्र का आत्मविश्वास लौट रहा है। कंपनियों ने जिन विस्तार योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया था, वे उन पर फिर से काम शुरू करने के लिए बेकरार हो रही हैं।
जब आर्थिक पृष्ठभूमि, खास कर घरेलू मोर्चे पर, इस तरह सुधर रही हो तो भारत के लिए जरूरी है कि वह मध्यम अवधि के लिए अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती से निपटे। यह चुनौती है सरकार के वित्तीय घाटे की। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा कारोबारी साल 2009-10 में करीब 7% रहने का अनुमान है, जो महज दो साल पहले के स्तर का दोगुना होगा। केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त राजकोषीय घाटा कारोबारी साल 2009-10 में लगातार दूसरे वर्ष 10% के ऊपर होगा।
सार्वजनिक ऋण (जीडीपी के प्रतिशत में) लगातार 5 सालों से घट रहा था, लेकिन इस कारोबारी साल में यह बढ़ने वाला है। बड़े पैमाने पर बढ़ती सरकारी उधारी से निजी निवेश के लिए गंभीर सवाल तो खड़े होंगे ही, ब्याज दरों के बढ़ने का भी खतरा हो जायेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में आ रहा सुधार रुक सकता है।
इस कारोबारी साल में निजी क्षेत्र से कर्ज की मांग कमजोर रही, जिसके चलते सरकारी उधारी की चिंता नहीं रही। लेकिन 2010-11 में स्थिति बदल सकती है, जब निजी क्षेत्र से कर्ज की मांग बढ़ेगी। जब अर्थव्यवस्था 6-7% की धीमी दरों पर बढ़ रही थी तो सरकारी घाटा ऊँचा रखने की नीति वाजिब लगती थी। लेकिन जब 2010-11 में विकास दर 8% से ऊपर रहने की उम्मीद है, तो ऊँचा सरकारी घाटा नहीं बनाये रखा जा सकता, इसे प्राथमिकता के साथ वापस घटा कर जीडीपी के करीब 3% के स्तर पर लाना जरूरी होगा।

 
• पिछले बजट से अब तक अर्थव्यवस्था काफी सँभली
• अब सरकारी घाटे पर नियंत्रण पहली प्राथमिकता
• सरकारी घाटा करीब 1% अंक कम होने की उम्मीद
• उत्पाद (एक्साइज) शुल्क बढ़ कर 12% हो सकता है
• सेवा कर फिर से 12% किये जाने की संभावना
• ऑटो जैसे क्षेत्रों पर असर 1-2 महीने तक ही
• विनिवेश का लक्ष्य 250-300 अरब रुपये तक संभव
• प्रत्यक्ष कर संहिता, जीएसटी पर स्थिति साफ हो
• कम-से-कम पेट्रोल के दाम नियंत्रण-मुक्त हों

केंद्र सरकार को यह प्रक्रिया शुरू करते हुए 2010-11 में सरकारी घाटा इस साल के करीब 7% से कम-से-कम 1% अंक घटाना चाहिए। हमें लगता है कि सरकार को अपने घाटे पर नियंत्रण पाने की जरूरत का पूरा अहसास है और इस साल के बजट में पूरा ध्यान इसी बात पर दिया जायेगा। 

सरकारी घाटे में यह कमी आमदनी को बढ़ाने और खर्चे पर नियंत्रण, दोनों रास्तों से आनी चाहिए। हालाँकि हमें लगता है कि सरकारी खर्चों को काटना थोड़ा मुश्किल है, इसलिए आमदनी को बढ़ाने के उपायों की भूमिका ज्यादा होगी। लिहाजा, हमारा अनुमान यह है कि सरकार वित्तीय प्रोत्साहनों को कुछ हद तक वापस ले लेगी।
इसका मतलब यह है कि उत्पाद (एक्साइज) शुल्क और सेवा कर (सर्विस टैक्स), दोनों में कुछ बढ़ोतरी होगी। उत्पाद शुल्क को 4% से बढ़ा कर 12% किया जा सकता है। हालाँकि यह प्रोत्साहन (स्टिमुलस) के पहले के स्तर 14% से थोड़ा कम ही रहेगा। सेवा कर को प्रोत्साहन से पहले के स्तर 12% पर वापस लाया जा सकता है।
लोगों की यह चिंता स्वाभाविक है कि प्रोत्साहनों को खत्म किये जाने से ऑटो जैसे क्षेत्रों के विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। लेकिन हमें यह नहीं लगता कि इनकी विकास दर में 1-2 महीनों से ज्यादा समय तक कोई कमी आयेगी। हमारी उम्मीद यह भी है कि सरकार 2010-11 के लिए विनिवेश के आक्रामक लक्ष्य रखेगी, जो 250-300 अरब रुपये तक का हो सकता है। इन उपायों के साथ-साथ अब तक टलती रही 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकारी घाटे में करीब 1% अंक तक की कमी लायी जा सकेगी।
खर्च की तरफ देखें, तो हमें लगता है कि सरकार ग्रामीण इलाकों पर ध्यान देना जारी रखेगी। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बनी प्रमुख योजनाओं, जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा),  भारत निर्माण और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन वगैरह पर खर्च बढ़ाया जायेगा। इन योजनाओं पर बढ़ने वाले खर्च की भरपाई इस बात से हो जायेगी कि इस बार वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत कर्मचारियों को बकाया भुगतान या कृषि कर्जमाफी का बोझ 2010-11 में नहीं होगा। इसलिए हमें यह नहीं लगता कि जीडीपी के प्रतिशत के रूप में देखें तो सरकारी खर्च में कोई खास कमी हो सकेगी।
आयकर (इन्कम टैक्स) की नीति में कोई खास बदलाव की उम्मीद नहीं है, चाहे आम लोगों की बात हो या कंपनियों की। लेकिन प्रत्यक्ष कर संहिता (डायरेक्ट टैक्स कोड) को लागू करने की समय-सीमा पर स्थिति साफ होने की उम्मीद जरूर है। साथ ही उद्योग जगत से मिले सुझावों के आधार पर इस संहिता में कितने बदलाव होंगे, खास कर मैट जैसे मुद्दों पर, इस बात के भी साफ संकेत मिलेंगे।
इसी तरह अप्रत्यक्ष करों (इनडायरेक्ट टैक्स) के लिए हमें उम्मीद है कि जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) लागू की नयी समय-सीमा और इसकी दरों का ढाँचा सामने रखा जायेगा। जीएसटी लागू होने पर राज्य सरकारों की आमदनी जितनी घटेगी, उसकी भरपाई करने के विवादित मुद्दे का समाधान मिलने की भी उम्मीद रहेगी।
ये दोनों कानूनी सुधार एक सरल, प्रभावी और मुकदमेबाजी घटाने वाले कर ढाँचे की ओर बढ़ने के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए अगर इन दोनों को लागू करने का साफ रास्ता अगर बजट में नहीं दिखा तो यह हमारी नजर में काफी नकारात्मक बात होगी।
एक और बड़ा मुद्दा है पेट्रोलियम पर सरकारी सहायता (सब्सिडी) का, जिसे बजट में सुलझाया जाना चाहिए। हालाँकि इस कारोबारी साल 2009-10 में सब्सिडी कच्चे तेल की कीमतें घटने के चलते कम रही है। लेकिन अगले साल विश्व अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद रहेगी, जिससे मांग बढ़ेगी और साथ ही कीमतें भी तेजी से बढ़ सकती हैं। इससे सरकारी घाटे पर नियंत्रण की सरकारी उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। इसलिए हमें उम्मीद है कि सरकार किरीट पारिख समिति की सिफारिशों पर अमल करेगी। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों कम-से-कम आंशिक रूप से सरकारी नियंत्रण से बाहर किया जायेगा। इसकी शुरुआत पेट्रोल से हो सकती है, भले ही डीजल को अभी नियंत्रण-मुक्त न किया जाये। (शेयर मंथन, 23 फरवरी 2010)

Last Updated ( Tuesday, 23 February 2010 12:07 )
 

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