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एफडीआई से किसान और उपभोक्ता दोनों का भला Print E-mail

सुदीप बंद्योपाध्याय, एमडी-सीईओ, कॉन्वेक्सिटी सॉल्यूशंस

अगर सरकार कम आय वाले वर्गों की मदद करना चाहती है तो संगठित खुदरा कारोबार (ऑर्गेनाइज्ड रिटेल) ही इसका रास्ता हो सकता है। 

जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) भारत सरकार की ओर से संसाधनों को बर्बाद करने वाली एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि रही है, जिसने कभी लक्ष्य के अनुसार नतीजे नहीं दिये और फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी बुरा असर डाला। इक्रियर ने अपने अध्ययन में पाया है कि संगठित खुदरा दुकानों से खरीदारी में संपन्न तबकों के बदले कम आय वर्ग वाले लोग ज्यादा बचत करते हैं, क्योंकि उन लोगों का सीधा लक्ष्य वहाँ मिलने वाली छूट पर होता है। अगर संगठित खुदरा क्षेत्र अपने प्राइवेट लेबल की रणनीति पर पूरी तरह अमल करे, जैसा उनकी ओर से संकेत मिलता रहा है, तो एफएमसीजी कंपनियाँ ग्राहकों का ज्यादा ख्याल रखने के लिए मजबूर हो जायेंगीं। खुदरा क्षेत्र का तो यह मानना है कि अगर उन्हें सीधे खेतों से फल-सब्जियाँ लाने की सुविधा मिल जाये तो समय के साथ अपना कारोबार बढ़ने पर वे इन चीजों को सस्ते भावों पर बेच पायेंगे। अगर ग्राहकों को ज्यादा विकल्प कम भावों पर मिलें, तो इससे बेहतर क्या होगा?

खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के बारे में चर्चा करने का यह बिल्कुल सही समय है, क्योंकि खाने-पीने की चीजों की महँगाई उफान पर है और इसके नीचे आने के कुछ खास संकेत नहीं मिल रहे हैं। भारत में कृषि ऊपज की काफी बर्बादी भी होती है। एक अनुमान है कि यह बर्बादी 1000 करोड़ रुपये तक की होती है। ज्यादा शर्मिंदगी की बात यह है कि इसका 57% यानी आधे से भी ज्यादा हिस्सा बर्बाद होने से रोका जा सकता है। एफडीआई को बढ़ावा देने की जरूरत यह है कि हमारे देश में उपभोक्ताओं की ओर से अदा की जाने वाली खुदरा कीमत का केवल एक तिहाई हिस्सा ही किसानों तक पहुँच पाता है। जिन देशों में संगठित खुदरा क्षेत्र की बाजार हिस्सेदारी ज्यादा है, वहाँ खुदरा कीमत का करीब दो तिहाई हिस्सा किसानों तक पहुँचता है। 

इक्रियर ने भी 2 साल पहले अपने अध्ययन में यह पाया है कि किसान बिचौलियों या मंडी में अपनी ऊपज बेचने के बदले जब सीधे संगठित खुदरा क्षेत्र को बेचते हैं तो उन्हें 60% ज्यादा फायदा होता है। इसलिए किसानों की कीमत पर कुछ बिचौलियों को पनपने देना सरासर अनुचित है। 

जितनी भी जानकारियाँ उपलब्ध हैं, वे यही संकेत देती हैं कि संगठित क्षेत्र को बढ़ावा मिलने पर किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों का फायदा होता है। सरकार की ओर से हाल में जो संकेत मिले हैं, उनसे इस संदर्भ में उत्साह बढ़ा है। खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति देना हमारे किसानों की बेहतरी की दिशा में काफी बड़ा असर डालेगा। (शेयर मंथन, 02 अगस्त 2010)

Last Updated ( Monday, 02 August 2010 15:28 )
 

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