
पेट्रोल की कीमत में इतनी बढ़ोतरी एक साथ पहले शायद कभी नहीं की गयी। शायद दुनिया भर में कहीं भी कभी पेट्रोल जैसी जरूरी चीज की कीमत एक साथ इतनी नहीं बढ़ायी गयी होगी।
सरकार ने यह कहा था कि वह पेट्रोल की कीमत तय करने की छूट तेल कंपनियों को दे रही है। यह केंद्रीय मंत्रिमंडल का फैसला था। लेकिन हमने यह देखा है कि वास्तव में कंपनियों को वह स्वायत्तता दी ही नहीं गयी है। पिछले 02 महीनों से कंपनियाँ कीमत बढ़ाना चाह रही थीं। लेकिन चुनाव आने वाले थे, इसलिए सरकार ने उनको इस बात की इजाजत नहीं दी थी। जैसे ही चुनाव प्रक्रिया खत्म हुई, उसके 18 घंटों के भीतर सरकार ने उनको इजाजत दे दी और कीमतें बढ़ा दी गयीं। वह भी सीधे-सीधे 5 रुपये प्रति लीटर। पेट्रोल की खुदरा कीमत में केंद्र और राज्यों के कर और शुल्क वगैरह का हिस्सा लगभग 50% है, अगर आप शिक्षा उपकर (एजुकेशन सेस) वगैरह सब मिला लें। अंडररिकवरी और घाटा दो अलग-अलग चीजें हैं। सरकार भी अंडररिकवरी की बात करती है। यह एक आर्थिक शब्द है, जिसका मतलब अनुमानित घाटा (नोशनल लॉस) है। यह उनकी मान्यता है कि उन्हें जितना लाभ मिलना चाहिए था वह नहीं मिल रहा। जिस हिसाब से हमारा पूरा पेट्रोलियम क्षेत्र चलाया जा रहा है और उसके पीछे की जो सोच है, वह बिल्कुल पुरानी हो चुकी है। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि जब तक सरकार अपनी सोच बदल कर नीतियों को नहीं बदलती है, और जब तक इस क्षेत्र पर सरकार के नियंत्रण को थोड़ा ढीला नहीं करती है, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। जहाँ तक सब्सिडी की बात है, सवाल है कि कौन किसको सब्सिडी दे रहा है? जो उपभोक्ता है, वही वास्तव में सब्सिडी दे रहा है। एक जेब से निकाल कर अगर दूसरी जेब में थोड़ा दे भी दिया गया, 10 रुपये निकाल कर के आप 2 रुपये दे देते हैं, तो वह सब्सिडी तो नहीं कहलायेगी। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि यह पूरी सोच पुरानी पड़ चुकी है। यह देश आगे बढ़ चुका है, इसकी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ चुकी है, आम आदमी की सोच भी आगे बढ़ चुकी है। लेकिन सरकार इसे अब भी 60 और 70 के दशक की सोच के साथ पेट्रोलियम क्षेत्र को चला रही है। नरेंद्र तनेजा, ऊर्जा विशेषज्ञ (Narendra Taneja, Energy Expert) (शेयर मंथन, 15 मई 2010) |