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मौद्रिक नीति पर दिल और दिमाग की उलझन Print E-mail

जगन्नादम तुनुगुंटला, रिसर्च प्रमुख, एसएमसी ग्लोबल

सितंबर 2008 में डॉ. डी सुब्बाराव (Dr. D. Subba Rao) के गवर्नर बनने के बाद से मौद्रिक नीति (Monetary Policy) की समीक्षा बैठकों के नतीजे आम तौर पर अनुमानों के अनुरूप रहे हैं, लेकिन नवंबर की यह बैठक उनके लिए कुछ छकाने वाली हो सकती है। 

अलग-अलग आँकड़ों से मिल रहे संकेत अस्पष्ट और उलझाने वाले हैं। इसलिए दिल कह रहा है कि इस बार आरबीआई ब्याज दरें नहीं बढ़ायेगा, लेकिन दिमाग कह रहा है कि दरें बढ़ेंगी। कल 02 नवंबर को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी मौद्रिक नीति की दूसरी तिमाही समीक्षा करने जा रहा है। आरबीआई ने पिछली तिमाही के मध्य में 16 सितंबर की समीक्षा में यह नजरिया रखा था कि महँगाई दर (Inflation) ही मौद्रिक नीति को निर्धारित करने वाला सबसे मुख्य पहलू रहेगा। यह माना जा सकता है कि अपनी नवंबर बैठक में भी आरबीआई अपने उसी नजरिये को कायम रखेगा। 

भारत में मध्यम-आय वर्ग के लोगों की बड़ी संख्या को देखते हुए इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आरबीआई के लिए महँगाई दर को सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाना जरूरी है। आरबीआई ने इसके लिए लगातार प्रयास किया है। बीते 12 महीनों में इसने रेपो दर को 4.75% से बढ़ा कर 6% किया, जिसके चलते कुछ हद तक फायदा मिला है। महँगाई दर अब 10% से ज्यादा के ऊँचे स्तरों से घट कर 8-9% के बीच आ गयी है। 

महँगाई भले ही कुछ घटी हो, लेकिन यह अब भी असुविधाजनक ढंग से ऊँची है। महँगाई दरअसल किताब में लगने वाले कीड़े की तरह है। यह आपकी संपत्ति को खा जाती है और आपको पता ही नहीं लगता कि आपकी संपत्ति घट गयी है। इसका असर समाज के निचले वर्गों के लोगों पर ज्यादा पड़ता है, जिनके पास सीमित संसाधन होते हैं और जिनकी क्रय-क्षमता (purchasing power) पर इसका काफी असर पड़ जाता है। 

इस संदर्भ में यह मानना तार्किक होगा कि आरबीआई मौद्रिक नीतियों को कसने वाले उपाय जारी रखेगा और ब्याज दरों को बढ़ायेगा। लेकिन कुछ ऐसे तथ्य हैं, जिनसे लगता है कि ब्याज दरें बढ़ाने के मसले पर आरबीआई इस बार दुविधा में हो सकता है। अगस्त महीने में औद्योगिक उत्पादन (IIP) में काफी तीखी कमी आयी है। वैसे इस बात की काफी संभावना है कि यह गिरावट शायद केवल एक बार की हो। लेकिन आरबीआई यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि क्या यह एक बार की ही गिरावट थी या विकास दर में कमी आने का कोई शुरुआती संकेत। 

दूसरे, विकसित देश लगातार लगभग शून्य ब्याज दरें बनाये रखने की नीति पर चल रहे हैं। इसलिए अगर भारत में ब्याज दरें और बढ़ीं तो इससे भारत में और अधिक त्वरित नकदी (Hot Money) आने लगेगी। इस लिहाज से इस बार रेपो दर में बढ़ोतरी नहीं करने का तर्क मजबूत होता है। दोनों ही तरीकों से आरबीआई संभवतः रिवर्स रेपो दर को बढ़ाना चाहे। इससे रेपो दर और रिवर्स रेपो दर के बीच के अंतर को घटाने में भी मदद मिलेगी। 

बीते समय में आरबीआई के ज्यादातर फैसले बिल्कुल उचित समय पर रहे हैं। दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंक या तो समय से पहले चलते रहे हैं या उचित समय के बाद,  जिससे वे छोटी अवधि की उम्मीदों को पूरा कर सकें। लेकिन ज्यादातर मामलों में आरबीआई ने साबित किया कि उसके कदम बिल्कुल ठीक समय पर थे। इसने छोटी अवधि की उम्मीदों और लंबी अवधि के स्थायित्व के बीच अच्छा संतुलन बनाये रखा है। इस बार भी यही उम्मीद की जा सकती है। (शेयर मंथन, 01 नवंबर 2010)

Last Updated ( Monday, 01 November 2010 13:57 )
 

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