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बाजार 2008 जैसे संकट की ओर नहीं बढ़ रहा Print E-mail

समीर अरोड़ा, फंड मैनेजर, हीलियस कैपिटल मैनेजमेंट

हाल में वैश्विक बाजारों के जबरदस्त उतार-चढ़ाव के बीच में भारतीय बाजार का व्यवहार काफी बेहतर रहा है।

लेकिन अभी बाजार ने अंतिम रूप से अपनी तलहटी बना ली है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि यूरोप और अमेरिका में आगे क्या होता है। लेकिन यह बात काफी सुकून देने वाली है कि तुलनात्मक रूप से भारत ने ज्यादा मजबूती दिखायी है।
वैश्विक बाजारों में स्थिरता कब लौटेगी, यह तो लाखों डॉलर का सवाल है। इसका जवाब किसी को मालूम नहीं है। लेकिन हम सब उम्मीद कर रहे हैं कि समय गुजरने के साथ स्थिति सुधरेगी। विश्व अर्थव्यवस्था अभी नाजुक है और पूरे भरोसे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।
कमजोर वैश्विक बाजार में भी भारत का प्रदर्शन अच्छा रह सकता है। कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था से कमोडिटी के भाव नीचे आते हैं, जिससे भारत को मदद मिलती है। लेकिन अगर संकट जैसी स्थिति बनती है तो उसे झेलना भारत के लिए मुश्किल होगा, क्योंकि इससे हमारे शेयर बाजार में विदेशी निवेश बिल्कुल रुक जायेगा या फिर पैसा वापस जाने लगेगा। अब तक ऐसा मानने का कोई कारण नहीं लग रहा है कि 2010 भी 2008 जैसे संकट की ओर बढ़ रहा है।
अभी छोटी अवधि में यूरो क्षेत्र के ढह जाने का खतरा मुझे नहीं लगता है। लेकिन लंबी अवधि की बात सोचें तो हाल के संकट ने यूरोपीय संघ के विरोधाभासों को सामने ला दिया है और अस्थिरता की संभावना रहेगी। अगर ऐसा कुछ होता है तो शुरुआत में वैश्विक बाजारों और भारतीय बाजार में बिल्कुल अफरातफरी मच जायेगी क्योंकि विदेशी मुद्रा और निश्चित आय वाले बाजारों में नुकसान उठाने वाले निवेशक बाजार में पूरी तरह से घबराहट फैला देंगे।
यह भारत के लिए काफी बुरी स्थिति होगी, क्योंकि हम विदेशी निवेश आने पर निर्भर हैं। निवेशकों का विश्वास भी हिल जायेगा और वे कोई भी जोखिम लेने से कतरायेंगे। इसका असर वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारतीय बाजार पर भी होगा। हाल में भारतीय अर्थव्यवस्था (जीडीपी) की विकास दर के जो आँकड़े आये हैं, उनसे कोई भी असंतुष्ट नहीं हो सकता। इस समय समस्या विश्व अर्थव्यवस्था में है, भारतीय अर्थव्यवस्था में नहीं।
अगर वैश्विक स्तर पर कोई घबराहट नहीं फैलती है तो भारतीय बाजार का प्रदर्शन समय के साथ अच्छा रहना चाहिए। मई महीने में जो कमजोरी आयी, उससे मजबूत विदेशी निवेश आने में कुछ महीनों की देरी हो सकती है। वैसे भी गर्मी का मौसम शेयर बाजार के लिए कमजोरी का ही समय होता है। हमें उम्मीद है कि आखिरी तिमाही तक फिर से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के निवेश की धारा मजबूत हो जायेगी, क्योंकि तब निवेशक 2011 के बारे में सोचने लगेंगे। शेयर बाजार में भारतीय निवेशकों का निवेश इतना कम है कि उन्हें निवेश का सही समय चुनने के बदले नियमित रूप से निवेश करते रहना चाहिए। यह बड़ा अजीब लगता है कि घरेलू निवेशकों के बदले विदेशी निवेशकों को भारत पर और हमारे शेयर बाजार पर ज्यादा भरोसा है। (शेयर मंथन, 14 जून 2010)

Last Updated ( Monday, 14 June 2010 08:44 )
 

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