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राजीव रंजन झा : मारक मेहता का बुद्धू बक्से पर प्रवचन जारी था – भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर काफी चिंताएँ हैं, रुपये में उतार-चढ़ाव भी उसी बात को दिखा रहा है, सरकार को लकवा मार गया है, भारत के विकास की कहानी में अब पहले वाली बात नहीं रही, विकास का पहिया धीमा पड़ गया है, कंपनियों के नतीजों पर इन सब बातों का असर दिखने वाला है, निवेशकों के लिए अभी खरीदारी का सही समय नहीं आया है, उन्हें और बेहतर मौके मिलेंगे।
प्रवचन पूरा होते-न-होते मोबाइल टिनटिना उठा। न्यूयॉर्क से आवाज आ रही थी। मारक मेहता का प्रवचन फिर शुरू हो गया – जी हाँ, अभी माहौल बिल्कुल हमारे अनुकूल है। सब लोग डर कर छिप गये हैं, मैदान खाली है। बस हमें इतना ध्यान रखना है कि हमारी रणनीति का बाजार में किसी को पता न चले। इसलिए हम धीरे-धीरे काम करेंगे। बीच-बीच में बाजार को डराते रहेंगे। जब केवल बोलने से काम नहीं चलेगा तो थोड़ा माल निकाल भी देंगे। मारक मेहता इन सब से निपटे तो सामने हाथों में वीणा लिये देवर्षि बैठे थे। पता नहीं कब से उनकी बातें सुने जा रहे थे। देवर्षि पूछ बैठे – क्यों मारक, यह क्या गोरखधंधा है? सामने वाला व्यक्ति बदलते ही तुम्हारी वाणी बदल जा रही है, तुम्हारे विचार बदल जा रहे हैं? तुम्हारे कार्य की दिशा क्या है? मारक मेहता हें हें करने लगे। बोले, प्रभु आप तो जानते हैं कि हमारे बाजार में यह सब चलता रहता है। माथा देख कर चंदन लगाते हैं। अभी क्या है ना कि बाहर के जो सेठ लोग हमारे यहाँ पैसा लगाते हैं, उनको मन तो बड़ा कर रहा है कि हमारे बाजार में और पैसा लगायें। लेकिन कौन महँगा खरीदना चाहता है? इसलिए बोलते रहते हैं कि अभी सब ठीक नहीं लग रहा है, ये गड़बड़ है, वो गड़बड़ है। जनता यह सब सुन कर डर जाती है। दूर बैठी रहती है। जनता समझती है कि इन बाहर के सेठों के पास काफी बुद्धि है और उससे भी ज्यादा पैसा है। वे जिधर चाहेंगे उधर ही बाजार जायेगा। इसलिए जनता बड़े ध्यान से उन सेठों की बात सुनती है। हम भी जनता के सामने उन्हीं सेठों का गाना गा देते हैं। अचानक मारक मेहता को ध्यान आया कि देवर्षि का अभिनंदन तो ढंग से किया ही नहीं। थाली उठाने के लिए बढ़े। कहा, प्रभु क्षमा करें। बातों-बातों में आपकी चंदन आरती तो भूल ही गया। नारद जी को ध्यान आया – माथा देख कर चंदन... फौरन बोले, अरे अभी रहने दो वत्स। लगता है प्रभु नारायण बुला रहे हैं। अगले ही पल वे गायब थे। Rajeev Ranjan Jha (शेयर मंथन, 30 जनवरी 2012) |
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Last Updated ( Monday, 30 January 2012 11:54 )
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