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राजीव रंजन झा : सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला सरकार के लिए एक बड़ा मौका साबित हो सकता है, बशर्ते वह इसे इस्तेमाल करना चाहे।
न्यायालय ने उसे कुछ बीती गलतियाँ सुधारने और आगे एक साफ-सुथरा दौर शुरू करने का मौका दे दिया है। अभी सबसे बड़ी सुर्खी तो यही है कि 122 लाइसेंस रद्द किये गये हैं। जिन कंपनियों के लाइसेंस रद्द किये गये हैं, उन्हें न्यायालय ने 4 महीने का समय दिया है। इन 4 महीनों तक ये ऑपरेटर अपनी सेवाएँ चलाते रह सकते हैं। लेकिन ये 4 महीने सरकार के लिए भी हैं, जिस अवधि में वह पुरानी उलझनों को सुलझाये और आगे का रास्ता निकाले। अभी तो हर किसी को न्यायालय का निर्णय विस्तार से पढ़ना है। इस फैसले की बारीकियों में पता नहीं क्या और निकल आये! लेकिन पहली नजर में यह साफ है कि अदालत ने गलत को सीधे-सीधे गलत कहने और उसे सुधारने की बात कह दी है। मैंने 26 अप्रैल 2011 को राग बाजारी में लिखा था, “अब तो रद्द करें घोटालों के 2जी लाइसेंस।” अगर सरकार ने उस समय ऐसा कदम उठा लिया होता, तो आज न्यायालय में उसकी यह फजीहत नहीं होती। उस समय मैंने यह भी सवाल उठाया था कि “अभी तक सीबीआई की सारी कार्रवाई केवल डीबी रियल्टी और स्वान टेलीकॉम के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। राजा ने 2जी स्पेक्ट्रम केवल स्वान टेलीकॉम को नहीं दिया था। तो क्या सीबीआई कह रही है बाकी किसी कंपनी को लाइसेंस और स्पेक्ट्रम देते समय राजा ने बड़े पाक-साफ तरीके से काम किया था। कहीं किसी और मामले में सीबीआई को कोई गड़बड़झाला नहीं दिखा है?” न्यायालय का आदेश साफ बता रहा है कि पूरा खेल ही गड़बड़झाले का था। सवाल उठेगा कि जो 122 लाइसेंस रद्द किये गये, उनमें से जिन लाइसेंसों के आधार पर कंपनियों ने बड़े नेटवर्क बिछा लिये, अरबों-खरबों रुपये का निवेश कर दिया, बड़ी संख्या में ग्राहक बना लिये, उन सबका क्या होगा? रास्ता साफ है – जैसे 3जी स्पेक्ट्रम की खुली नीलामी की गयी थी, वैसे ही 2जी के इन सभी 122 लाइसेंसों की भी खुली नीलामी कर दी जाये। अगर कोई कंपनी अपने लाइसेंस को बचाना चाहे तो बोली लगाये और जीते। बोली जीत जाये तो पहले दी गयी रकम काट कर वह बाकी रकम जमा करे। अगर बोली न लगाये तो पिछली रकम जब्त! दूसरा पहलू आपराधिक षडयंत्रों और रिश्वतखोरी का है। इस पहलू पर कार्रवाई चलती रहे। Rajeev Ranjan Jha (शेयर मंथन, 02 फरवरी 2012) |
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Last Updated ( Thursday, 02 February 2012 13:50 )
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