Home राग बाजारी ‘वे’ सर्वोच्च न्यायालय से ज्यादा कानून जानते हैं !
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‘वे’ सर्वोच्च न्यायालय से ज्यादा कानून जानते हैं ! Print E-mail

राजीव रंजन झा : सर्वोच्च न्यायालय का 2जी घोटाले पर कल का फैसला आने के बाद विश्लेषकों के एक तबके का रोना-धोना शुरू हो गया है।

कुछ लोगों की टिप्पणियाँ तो हैरान करती हैं। एक महानुभाव के मुख से सुना कि यह फैसला भारत में विधि के शासन (रूल ऑफ लॉ) के बारे में विदेशी निवेशकों के भरोसे को तोड़ देगा। दैया रे दैया! विधि के शासन का सिद्धांत समझने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने इन विशेषज्ञों की कक्षा में तो कभी पढ़ाई ही नहीं की, फिर उन्हें भला क्या पता विधि के शासन के बारे में!
कुछ लोगों को निवेश के माहौल की चिंता सता रही है। यह टिप्पणी दरअसल उन्हीं विदेशी निवेशकों की अवमानना है, जिनके पक्ष में बोलने का ढोंग रचा जा रहा है। यह एक तरह से ऐसा मानना है कि सारे विदेशी निवेशक केवल नियमों को ताक पर रख कर अवैध कमाई के मौके तलाशने के लिए भारत आ रहे थे। अदालत ने यही तो कहा है कि गलत नीति या नीति के गलत पालन की बुनियाद पर कोई महल खड़ा किया गया हो तो उसे गिरा दिया जायेगा। यह फैसला भारत में निवेश की बुनियाद मजबूत ही करेगा। घरेलू और विदेशी सारे निवेशकों को इससे यही संदेश मिलेगा कि साफ-सुथरे ढंग से निवेश करने और कारोबार चलाने का कोई विकल्प नहीं है।
जनवरी 2008 से जारी सभी 122 लाइसेंस रद्द होने पर कुछ कंपनियाँ कह सकती हैं कि उन्होंने तो केवल सरकार की बनायी प्रक्रिया को पूरा किया, उसके नियमों को माना और सरकार से मिले लाइसेंस के आधार पर भारी निवेश कर दिया। वे पूछ सकती हैं कि उनकी गलती क्या है और उन्हें होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा? लेकिन अगर वे यह सवाल पूछने और राहत पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटीशन) दाखिल करें तो कहीं उन्हें लेने के देने न पड़ जायें। अभी तो सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ कंपनियों को 5 करोड़ रुपये और कुछ को 50 लाख रुपये का खर्च भरने को कहा है। ध्यान दें कि यह जुर्माना नहीं, खर्च भरना है। मतलब अदालत ने सरकारी प्रक्रिया को गलत ठहरा कर बात वहीं छोड़ दी है। उसने गलत लाभ देने वाली सरकार को फटकारा, लेकिन गलत लाभ पाने वालों पर कार्रवाई का पहलू नहीं छुआ क्योंकि वह मामला तो अभी निचली अदालत में चलना है। लेकिन समीक्षा याचिका लेकर सर्वोच्च न्यायालय में फिर जाने पर कहीं चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौट आये वाली हालत न हो जाये। Rajeev Ranjan Jha
(शेयर मंथन, 03 फरवरी 2012)

Last Updated ( Friday, 03 February 2012 12:11 )
 

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