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एफआईआई खरीदारी रहने तक कैसे गिरेगा बाजार Print E-mail

राजीव रंजन झा

विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की खरीदारी हाल में कुछ हल्की पड़ी है, लेकिन लगातार जारी है।

नवंबर महीने में अब तक केवल पहले कारोबारी दिन 3 नवंबर 2009 को एफआईआई की खरीद-बिक्री का आँकड़ा लाल था। उसके बाद से लगातार 11 कारोबारी दिनों से एफआईआई खरीदारी चल रही है। अगर एनएसई के आँकड़े लेकर चलें, तो इन 11 दिनों में उनकी तरफ से 4507 करोड़ रुपये की खरीदारी आ चुकी है। सेबी के आँकड़ों के हिसाब से यह खरीदारी करीब 4700 करोड़ रुपये की बनती है।
दरअसल मार्च 2009 से ही एफआईआई की खरीदारी का अभियान जारी है और भारतीय शेयर बाजार के ऊपर चढ़ने का भी। मार्च 2009 से अब तक किसी भी महीने में एफआईआई शुद्ध रूप से बिकवाल नहीं रहे। कभी उनकी खरीदारी एकदम तेज हो जाती है, जैसे मई में 20607 करोड़ रुपये की, या सितंबर में 19,940 करोड़ रुपये। कभी यह खरीदारी कुछ हल्की पड़ जा रही है, जैसे जून में 3225 करोड़ रुपये या अगस्त में 4029 करोड़ रुपये की। लेकिन कुल मिला कर उनकी खरीदारी बदस्तूर जारी है। सवाल यही है कि जब तक उनकी खरीदारी जारी है, जब तक बाजार कैसे फिसलेगा?
घरेलू संस्थाएँ जरूर मुनाफावसूली करती दिख रही हैं। उनकी मुनाफावसूली ने ही पिछले 5 कारोबारी दिनों से निफ्टी को 5000-5100 के छोटे-से दायरे में बाँध रखा है। लेकिन घरेलू संस्थाओं की मुनाफावसूली बाजार को नीचे नहीं ले जाती, खास कर उस समय जब एफआईआई खरीदारी चल रही हो। म्यूचुअल फंडों ने सितंबर में भी 2334 करोड़ रुपये की और अक्टूबर में 5194 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की थी ना! फिर भी सितंबर में निफ्टी 4662 से चढ़ कर 5084 तक गया। अक्टूबर में जरूर उनकी मुनाफावसूली कुछ रंग लायी, लेकिन बाजार टूटा नहीं।
मार्च से अब तक एफआईआई खरीदारी जारी है, इसका मतलब यह नहीं है कि आगे चल कर एफआईआई बिकवाली आ ही नहीं सकती। यह तो विश्व बाजारों की हलचल और भारतीय शेयर बाजार के बारे में उनकी धारणाओं पर निर्भर करता है। यह इस पर निर्भर करता है कि वे किस स्तर को मुनाफावसूली के लिए ठीक मानते हैं। इस पर निर्भर करता है कि वे कारोबारी नजरिया अपनाते हैं या लंबी अवधि के निवेश के लिए खरीदारी पर जोर देते रहते हैं। लेकिन मेरा कहना केवल यही है कि जब तक उनकी खरीदारी जारी है, तब तक बाजार कुछ बढ़ता ही रहेगा, कोई बड़ी गिरावट तो मुश्किल ही लगती है। जब उनके आँकड़े लाल दिखने लगें, तब जरूर मान लें कि सावधान होने का मौका आ गया है। (शेयर मंथन, 19 नवंबर 2009)

Last Updated ( Thursday, 19 November 2009 08:20 )
 

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