राजीव रंजन झा
फिर एक विद्वान समिति बनी, सरकार ने ढिंढोरा पीट कर उस समिति की रिपोर्ट अपने हाथ में ली, और पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस (एलपीजी) के दाम बढ़ाने की भूमिका तैयार हो गयी।
यह समिति और सरकार हमें बता रही है कि जब हम अपनी अपनी जिंदगी की गाड़ी चलाते हैं, अपनी रसोई बनाते हैं तो मजबूर सरकार को हमें कितनी खैरात (सरकारी सहायता या सब्सिडी) देनी पड़ती है। लेकिन सरकार ने पेट्रोलियम कीमतों के पूरे मसले पर एक मुद्दे को बड़े चुपके से किनारे कर रखा है। यह मुद्दा है पेट्रोल-डीजल पर वसूला जाने वाले तमाम शुल्कों (ड्यूटी) का। किरीट पारिख समिति ने तेल क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी, टिकाऊ, स्वस्थ बनाने की सारी बातें की, लेकिन इस मुद्दे को जरा भी नहीं छेड़ा। आपको समझाया जा रहा है कि जब आप 1 लीटर पेट्रोल खरीदते हैं तो उस पर तेल कंपनी को 3 रुपये का घाटा होता है, क्योंकि वह लागत से कम कीमत आपसे ले रही है। लेकिन आपको यह नहीं बताया जा रहा है कि आप उस 1 लीटर के लिए जो 44-50 रुपये दे रहे हैं, उसका करीब आधा हिस्सा सरकारी खजाने में जा रहा है – कुछ केंद्र सरकार के हिस्से में, कुछ राज्य सरकार के हिस्से में। आपको यह नहीं बताया गया कि कल अगर पेट्रोल की कीमत 3 रुपये बढ़ा दी गयी, तो भी तेल कंपनी को उसमें से करीब 1.5 रुपये ही मिलेंगे। तेल कंपनियों का घाटा तो पूरा नहीं निपटेगा, लेकिन सरकार की कमाई जरूर बढ़ जायेगी! पेट्रोल पर तेल कंपनियों का पूरा घाटा खत्म करना हो, तो कीमत 3 रुपये नहीं, 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ानी पड़ेगी। एक ग्राहक ने तो 1 लीटर के 44-50 रुपये दे दिये। उसमें से तेल कंपनी को केवल 22-25 रुपये मिले और बाकी हिस्सा सरकार ने रख लिया तो इसमें ग्राहक की क्या गलती है। अगर तेल कंपनी को 3 रुपये का घाटा हो रहा है तो सरकार अपने शुल्क घटा कर वह पैसा तेल कंपनी को दे दे। आपको समझाया जा रहा है कि आपकी गाड़ी सरकारी खैरात पर चल रही है। लेकिन आपको यह नहीं बताया जा रहा है कि सरकार को मिलने वाले उत्पाद (एक्साइज) शुल्क का आधा हिस्सा पेट्रोलियम पदार्थों से मिलता है। पेट्रोलियम पदार्थों पर लगा सेल्स टैक्स खत्म हो जाये तो राज्य सरकारें दीवालिया हो जायें। साहब जी, सरकार हमारी गाड़ी नहीं चला रही, हमारा दिया शुल्क सरकार की गाड़ी चला रहा है। उसी में से कुछ पैसा सरकारी तेल कंपनियों को देकर सारी जनता पर एहसान लादा जा रहा है। अगर वाकई मनमोहन सरकार तेल क्षेत्र में सुधार की इच्छुक है तो सबसे पहले इस क्षेत्र पर लगे भारी शुल्कों को घटा कर शुरुआत करे। (शेयर मंथन, 04 फरवरी 2010) |
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Last Updated ( Thursday, 04 February 2010 08:22 )
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