राजीव रंजन झा
एक कारोबारी और एक निवेशक की दुविधाएँ हमेशा अलग होती हैं, उनके डर और लालच भी काफी अलग किस्म के होते हैं।
जब एक कारोबारी को सबसे ज्यादा डर लग रहा होता है, उसी समय एक निवेशक के लिए लालची बनने का सबसे अच्छा मौका होता है। लेकिन कब डरना ठीक है और कब लालची बनना, इसे समझने के लिए दोनों के पैमाने भी एकदम अलग होते हैं। एक कारोबारी की नजर बाजार की चाल पर होती है, उसके संवेग (मोमेंटम) पर होती है। एक निवेशक की नजर मूल्यांकन पर होती है। इस समय एक कारोबारी के लिए बाजार की दिशा को लेकर डरना वाजिब है। निफ्टी किन स्तरों तक फिसलेगा और कहाँ इसे सहारा मिलेगा, इसके बारे में सबके अपने-अपने अनुमान हैं। लेकिन बाजार कहीं और फिसला तो कारोबारियों का डर भी और बढ़ेगा। यहाँ से निफ्टी 100 अंक और फिसलेगा तो लोग 400 अंक नीचे तक की बातें सोचने लगेंगे। अगर यह 200 और फिसला तो लोग 4000 के नीचे के स्तर देखने लगेंगे। यह डर स्वाभाविक ही होगा, जिसे तकनीकी विश्लेषक अलग-अलग तरीकों से समझायेंगे। लेकिन एक निवेशक बाजार के फिसलने पर एक सीमा के बाद ज्यादा लालची होता जायेगा। कोई चीज जितनी सस्ती मिले, उतना ही अच्छा होता है ना! लेकिन सवाल है कि यह सीमा क्या होगी? निफ्टी का मूल्यांकन अगर देखें तो 1 जनवरी 2009 से अब तक इसके पीई अनुपात (बीते 12 महीनों के आधार पर) का औसत करीब 19 का बैठता है। हालाँकि इस दौरान यह 11.96 का भी रहा, 22 जनवरी 2009 को, और फिर यह 23.59 तक भी गया, 06 जनवरी 2010 को। अगर कुछ और लंबी अवधि लें, तो 2003 से अब तक निफ्टी के पीई अनुपात का औसत 17.7 बैठता है। इस दौरान सबसे कम 10.7 का पीई अनुपात 27 अक्टूबर 2008 को और सबसे ज्यादा 28.3 का अनुपात 8 जनवरी 2008 को था। इस लिहाज से यह मान सकते हैं कि मार्च 2009 से अब तक चली तेजी के दौरान किसी भी समय बाजार अति-उत्साह के मुकाम तक गया ही नहीं। खैर, अगर 01 जनवरी 2009 से अब तक के औसत यानी 19.05 का पीई लें, तो उस अनुपात पर निफ्टी का स्तर करीब 4453 का बनता है। अगर 2003 से अब तक के औसत यानी 17.7 को लें, तो उस पर निफ्टी का स्तर 4137 बैठता है। इसलिए मेरा मानना होगा कि अगर बाजार फिसले तो 4450 के करीब आक्रामक खरीदारी की जा सकती है। फिर 4150 के आसपास अपनी नकदी का लगभग समूचा निवेश किया जा सकता है, पर शायद वैसा मौका नहीं मिलने वाला। आप पूछेंगे कि यह भरोसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि भारतीय कंपनियों की प्रति शेयर आय (ईपीएस) घटने का दौर बीत गया है। (शेयर मंथन, 08 फरवरी 2010) |