राजीव रंजन झा
एनटीपीसी के पब्लिक इश्यू (एफपीओ) के बाद बाजार के जानकारों को लगा था कि शायद सरकार इससे कुछ सबक लेगी।
अब रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन आरईसी के एफपीओ ने साबित किया है कि सरकार सबक सीखना नहीं जानती। सरकारी नीतियाँ तय करने वाले शीर्षस्थ लोगों में से एक साफ कहते हैं कि सरकार की जेब में तो पैसा आ गया ना, इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि आम निवेशकों ने इश्यू में कितनी हिस्सेदारी की। सरकार को अपना घाटा पूरा करने के लिए पैसा चाहिए – वह पैसा केवल संस्थाओं की जेब से आये तो क्या फर्क पड़ता है। ताज्जुब तब होता है, जब बाजार अर्थव्यवस्था पर भरोसा करने वाले लोग ऐसी बातें कहें। अगर एलआईसी ने आखिरी दिन आरईसी के एफपीओ को सहारा नहीं दिया होता तो क्या केवल बाजार भरोसे इस इश्यू का बेड़ा पार लग पाता? आप तो बाजार अर्थव्यवस्था को मानते हैं ना, तो छोड़ दिया होता इस एफपीओ को बाजार के भरोसे! क्यों सरकारी दबाव में संस्थाओं को कभी एनटीपीसी और कभी आरईसी के पब्लिक इश्यू उबारने में जुटना पड़ता है। बार-बार यही दिखता है कि सरकार भी अपनी कंपनियों के इश्यू लाते समय उतनी ही लालची बन रही है, जितने आम तौर पर निजी प्रमोटर होते हैं। लेकिन यह रवैया न तो निजी कंपनियों के लिए आगे चल कर अच्छा साबित होता है, न ही सरकारी कंपनियों के लिए होगा। रिलायंस पावर के एक आईपीओ ने पूँजी बाजार में रिलायंस ब्रांड को ही कमजोर कर डाला। ऐसा नहीं है कि भविष्य में लोग रिलायंस नाम वाले किसी इश्यू में पैसा नहीं लगायेंगे। लेकिन वे सावधान रहेंगे, प्रबंधन की बातों पर पहले जैसा भरोसा नहीं करेंगे। इसी तरह सरकार को अगर अपनी कंपनियों के इश्युओं में बाजार की परवाह नहीं रहेगी, तो बाजार भी इन इश्युओं की परवाह नहीं करेगा। एनटीपीसी और आरईसी, दोनों के एफपीओ सीधे-सीधे यही बताते हैं। पता नहीं सरकार यह क्यों नहीं समझ पा रही कि कोई एफपीओ मौजूदा बाजार भाव से ठीक-ठाक छूट पर ही बिक सकता है। अगर एफपीओ में बाजार सस्ता नहीं मिलेगा, तो लोग उसमें आवेदन करने के बदले बाजार की गिरावट का ही इंतजार क्यों नहीं कर लेंगे। शायद सरकारी सोच यह बन गयी है कि संस्थागत निवेशक तो एफपीओ में पैसा लगायेंगे ही, क्योंकि उन्हें बड़े स्तर पर निवेश का मौका इसी में मिलता है। लेकिन भाव तो वे भी देखते हैं। यकीन नहीं तो अपना अगला एफपीओ एलआईसी को फरमान जारी किये बिना बस बाजार भरोसे छोड़ कर देख ले सरकार। (शेयर मंथन, 24 फरवरी 2010) |
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Last Updated ( Wednesday, 24 February 2010 10:12 )
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