राजीव रंजन झा
बजट से ठीक पहले बाजार की उम्मीदों और आशंकाओं का पेंडुलम बार-बार इधर से उधर झूलता रहता है।
बजट को लेकर कभी कहा गया कि काफी उम्मीदें लगायी जा रही हैं और वित्त मंत्री इन उम्मीदों को पूरा करने की हालत में नहीं हैं। कभी कहा गया कि बाजार इस बजट से काफी कम उम्मीदें लगा रहा है और यह बात बजट के बाद की संभावनाओं के लिए अच्छी है। अब रेल बजट को देख कर बाजार में यह उम्मीद जगी है कि आम बजट में भी शायद उद्योगों का ख्याल रखा जाये और कम बोझ डाला जाये। दरअसल ममता बनर्जी से उद्योगों को यह उम्मीद नहीं थी कि वे निजी क्षेत्र के लिए रेलवे के दरवाजे खोलने की बातें करेंगी। कुछ लोक-लुभावन बातें तो होनी ही थीं, उन्हें अपने राज्य में जल्दी ही चुनाव भी तो लड़ना है। लेकिन इस लोक-लुभावन रेल बजट में भी कई बातें भविष्य के बारे में एक साफ सोच का संकेत देती हैं, कुछ उम्मीदें जगाती हैं। अगले 10 साल में 25,000 किलोमीटर की रेल लाइनें बिछाने की ही बात देख लें। इंडिया इन्फोलाइन के उपाध्यक्ष (रिसर्च) अमर अंबानी ने अपनी एक टिप्पणी में बिल्कुल सटीक कहा है कि अगर इस लक्ष्य का 40-50% भी हासिल किया जा सका तो इससे रेलवे में एक बड़ा बदलाव आ जायेगा। इस क्षेत्र में सक्रिय कंपनियों के लिए तो यह काफी बड़ा अवसर होगा ही। जरा सोचें कि पिछले 58 सालों में रेलवे ने 10,419 किलोमीटर की रेल लाइनें बिछायी हैं। रेलवे का कुल नेटवर्क 64,015 किलोमीटर का है। भारतीय रेलवे के अब तक के 157 सालों के इतिहास में जो काम हो सका है, उसका करीब 40% काम अगले 10 वर्षों में करने की बात हो रही है। अगर वास्तव में ये लक्ष्य हासिल हो गये, या जैसा अमर अंबानी कह रहे हैं कि इसका आधा भी हो जाये, तो ममता बनर्जी के इस रेल बजट को ऐतिहासिक महत्व मिल जायेगा। कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य होगा कि रेल बजट में माल भाड़ा नहीं बढ़ा। लेकिन हकीकत यही है कि माल भाड़ा पहले ही वाजिब स्तरों से ज्यादा है और माल भाड़ा बढ़ते ही माल ढुलाई की लागत का हिसाब-किताब सड़क मार्ग के पक्ष में हो ज्यादा हो जायेगा। और रही बात रेल बजट के रास्ते पर आम बजट रखे जाने की, तो इतना याद दिला दूँ कि ममता बनर्जी और प्रणव मुखर्जी एक राज्य से भले ही हों, दोनों के राजनीतिक फलक बिल्कुल एक जैसे नहीं हैं। प्रणव बाबू चलेंगे अपने हिसाब से। मुझे लगता है कि उनके बजट को देख कर बाजार चौंकेगा, खुश होगा। (शेयर मंथन, 25 फरवरी 2010) |
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Last Updated ( Thursday, 25 February 2010 10:37 )
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