राजीव रंजन झा
पिछले कुछ सालों में भले ही नीतियाँ साल भर बनती रही हों, लेकिन बजट अब भी आर्थिक नीतियों का सबसे बड़ा सालाना जलसा है।
वित्त मंत्री के पिटारे से क्या निकलेगा और बाजार की प्रतिक्रिया कैसी रहेगी, इसे समझने के लिए मोटे तौर पर मैंने 7 पैमाने बनाये हैं। पहला पैमाना है उत्पाद (एक्साइज) शुल्क। दूसरा पैमाना है सर्विस टैक्स का। लोगों ने इन दोनों में कम-से-कम 2% अंक की बढ़ोतरी पक्की मान रखी है। उत्पाद शुल्क में तो इससे ज्यादा बढ़ोतरी की भी बातें कही जाती रही हैं। मुझे लगता है कि वित्त मंत्री इन शुल्कों को बढ़ाते समय थोड़ा संयम दिखायेंगे। तीसरा पैमाना है गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) का। इसे लागू करने के ठोस संकेत मिलना बाजार के लिए सकारात्मक होगा, और ढुलमुल जिक्र या बिल्कुल चुप्पी नकारात्मक। चौथा पैमाना है प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स) का। आम लोगों या कंपनियों के आयकर में शायद ज्यादा फेरबदल नहीं हों, क्योंकि आयकर के पूरे कानून को ही नये सिरे से लिखने की कवायद चल रही है। लेकिन इस नये आयकर कानून के मसौदे की कुछ कड़वी बातें इस बजट में डाल दी गयीं, तो बाजार का हाजमा बिगड़ सकता है। पाँचवाँ पैमाना है सरकारी घाटे का। यहाँ वित्त मंत्री मुझे काफी सुविधाजनक स्थिति में दिख रहे हैं। इसलिए उनके पास यहाँ गुंजाइश है बाजार को खुश करने की। छठा पैमाना है विनिवेश का। पिछले बजट में बेहद मामूली लक्ष्य रखा गया, लेकिन इसके बाद सरकार ने काफी आक्रामक ढंग से इस मोर्चे पर काम किया। लिहाजा उम्मीद है कि इस बजट में विनिवेश का लक्ष्य बड़ा रखा जा सकता है। सातवाँ पैमाना है भविष्य के बारे में एक बड़ी दृष्टि का। जिस तरह ममता बनर्जी ने रेल मंत्रालय के लिए विजन 2020 पेश किया, उसी तरह से अगर आम बजट में विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए एक बड़ी महत्वाकांक्षी दृष्टि रखी जाये, तो यह काफी सकारात्मक बात होगी। इस बात को मैंने सबसे अंत में लिखा है, लेकिन मेरे हिसाब से सबसे बड़ी बात यही होगी। बाकी सारी बातें तो साल भर का हिसाब-किताब ही हैं। (शेयर मंथन, 26 फरवरी 2010) |
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Last Updated ( Friday, 26 February 2010 10:52 )
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