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क्यों खरीदार बन गये हैं अब एफआईआई Print E-mail

राजीव रंजन झा

बजट के दिन से ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की खरीदारी का जो सिलसिला बना है, वह गुरुवार को भी जारी रहा, भले ही सेंसेक्स-निफ्टी की बढ़त का सिलसिला थोड़ा अटका है।

बजट के दिन 841 करोड़ रुपये, अगले कारोबारी दिन यानी मंगलवार को 1335 करोड़ रुपये, इस बुधवार को भी 959 करोड़ रुपये और कल 634 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी। इन 4 कारोबारी दिनों में एफआईआई कुल 3770 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी कर चुके हैं। आँकड़ों में साफ दिख रहा है कि बजट का दिन एफआईआई के रुख में निर्णायक बदलाव लेकर आया है। हालाँकि उससे कुछ पहले ही ऐसे संकेत दिखने लगे थे कि उनकी इकतरफा बिकवाली अब खत्म हो रही है। फरवरी के दूसरे हफ्ते से उनकी लगातार बिकवाली का सिलसिला खत्म हो गया था। लेकिन तब उनकी लगातार खरीदारी नहीं आ रही थी। बीच-बीच में उनकी बिकवाली उभर जा रही थी। जब खरीदारी उभर भी रही थी तो उसमें ज्यादा जोश नहीं दिख रहा था। लेकिन बजट के बाद उनकी लगातार खरीदारी दिख रही है, और उस खरीदारी में एक जोश भी है।
खास बात यह है कि गुरुवार को जब सेंसेक्स-निफ्टी अटके, एफआईआई तब भी खरीदार ही बने रहे। उनके सीधे मुकाबले में घरेलू संस्थाएँ (डीआईआई) बजट के बाद से ही लगातार बड़ी बिकवाली कर रही हैं। बजट से अब तक बीते 4 कारोबारी दिनों में उनकी 2660 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली हो चुकी है।
एक बार फिर वही पुरानी कहानी दिख रही है कि जब एफआईआई खरीदारी पर उतरें तो बाजार  की तेजी रुकती नहीं, और जब घरेलू संस्थाएँ बाजार को सहारा दें तो ज्यादा बड़ी गिरावट आती नहीं। फिलहाल, इन दोनों तरह के संस्थागत निवेशकों के रुख को समझने की कोशिश करें तो ऐसा लगता है कि अब तक भारतीय बाजार को लेकर थोड़ा डर रहे एफआईआई निवेशकों के मन से हिचक निकल गयी है, इसलिए वे ऊँचे भावों पर भी खरीदारी कर रहे हैं। ऊँचे भावों पर खरीदारी का मतलब यही लगता है कि वे थोड़ी लंबी अवधि को ध्यान में रख कर चल रहे हैं। दूसरी ओर हाल में निचले स्तरों पर अपनी खरीदारी से बाजार को लगातार सहारा देती रही घरेलू संस्थाएँ अब कारोबारी नजरिये से थोड़ी मुनाफावसूली कर रही हैं। शायद एक पक्ष निफ्टी में 500-1000 अंक ऊपर के लक्ष्य लेकर चल रहा है, तो दूसरा पक्ष 100-200 अंक की नरमी पर दाँव लगा रहा है! (शेयर मंथन, 05 मार्च 2010)

Last Updated ( Friday, 05 March 2010 07:12 )
 

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