 राजीव रंजन झाबाजार में यह धारणा जोर पकड़ रही है कि मार्च में भारतीय बाजार ठंडा ही रहेगा।
इसके पीछे बीते सालों का इतिहास है। जब भविष्य अनिश्चित लगता है तो लोग अतीत में झाँकते हैं। यह सोचना स्वाभाविक ही है कि अगर बीते सालों में मार्च महीने में भारतीय बाजार के गिरने या ठंडे पड़ने का रिवाज रहा है, तो इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना ज्यादा होगी। लेकिन कोई नतीजा निकालने से पहले बीते सालों के आँकड़ों को बारीकी से देखना बेहतर नहीं होगा क्या? अगर हम 1991 से अब तक के आँकड़े देखें तो यही लगता है कि मार्च आम तौर पर भारतीय शेयर बाजार के लिए कमजोर महीना रहता है। बीते 19 सालों में 13 बार मार्च में सेंसेक्स फिसला है, जबकि केवल 6 बार ऊपर चढ़ पाया है। लेकिन बीते 19 सालों में भारतीय बाजार काफी बदला भी है। तो इस बदलाव को भी देखें। साल 2000 से लेकर साल 2005 तक लगातार 6 साल मार्च महीना कमजोरी का रहा, लेकिन इसके बाद के 4 सालों में 3 बार सेंसेक्स मार्च में मजबूत रहा। केवल 1 बार साल 2008 में यह नीचे गया। लेकिन साल 2008 में गिरावट मार्च महीने की खासियत नहीं थी, पूरा साल ही खराब था। इस साल मार्च में अब तक सेंसेक्स करीब 4% बढ़त पा चुका है। तो इसका मतलब यह है कि लंबा इतिहास मार्च में गिरावट की बात बताता है, लेकिन हाल के कुछ साल मार्च को मजबूत बता रहे हैं। पिछले इतिहास और हाल के कुछ सालों में बाजार में एक बड़ा फर्क विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की वजह से आया है। एफआईआई बजट के बाद से अब तक लगातार खरीदार रहे हैं। मार्च के अब तक के 7 कारोबारी दिनों में उनकी शुद्ध खरीदारी 7511 करोड़ रुपये की हो चुकी है। घरेलू संस्थागत निवेशकों की बिकवाली के बावजूद एफआईआई की बड़ी खरीदारी अगर जारी रहती है, तो मार्च में कमजोरी होगी या तेजी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अगर हम मान लें कि हाल में घरेलू संस्थाओं की हाल की बिकवाली एनएमडीसी के इश्यू में निवेश की रकम जुटाने के लिए है, तो फिर यह इश्यू पूरा होते ही उनकी बिकवाली थम जानी चाहिए। यानी कल के बाद वे खरीदार न भी बनें तो शायद उनकी बिकवाली पहले जैसी न रहे। तो क्या मार्च को लेकर अब भी आप मायूस ही हैं? पहले ही 4% बढ़त दे चुका है ये महीना! (शेयर मंथन, 11 मार्च 2010) |