राजीव रंजन झा
प्रणव-दा पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों को लेकर मिल रही थोक बदनामी से गुस्से में हैं।
वाजिब है उनका गुस्सा, क्योंकि दाम बढ़ने का फायदा लेने में तो राज्य सरकारें भी खूब शामिल रहती हैं, लेकिन बदनामी 100% केंद्र सरकार के हिस्से में चली जाती है। तो अब प्रणव-दा ने यह ठीक समझा कि जनता को सच बताया जाये, जिससे बदनामी में भी राज्य सरकारों को उनका उचित हिस्सा मिले! आप शायद थोड़े चकित होंगे यह सब पढ़ कर। पेट्रोल-डीजल के दाम तो तेल कंपनियों को राहत देने के लिए बढ़ाये गये थे ना, तो केंद्र और राज्य सरकारों को फायदे की ये बात बीच में कहाँ से आ गयी? पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमत से तो तेल कंपनियों का घाटा कम हो रहा होगा ना, सरकारों को फायदे की बात क्यों हो रही है? अरे आपको पता नहीं, आप पेट्रोल खरीदने के लिए जितने पैसे देते हैं, उसमें से आधा पैसा इन्हीं सरकारों के पास जाता है। आपकी जेब से निकले उसी पैसे के दम पर तो सरकार सब्सिडी देने का ढिंढोरा पीटती है। आपके पैसे से ही आपको खैरात (सब्सिडी) देने का दावा किया जाता है। और फिर, उसी सब्सिडी का हवाला देकर दाम बढ़ाने की मजबूरी दिखायी जाती है। खैर, वित्त मंत्री को यह जरूरी लगा कि दाम बढ़ने की बदनामी में भी राज्य सरकारें उसी अनुपात में हिस्सेदारी करें, जिस अनुपात में वे पेट्रोल-डीजल पर कमाई करती हैं। इसलिए प्रणव-दा ने कल लोकसभा को बताया कि पेट्रोलियम पदार्थों पर केंद्र सरकार को मिलने वाले 108,000 करोड़ रुपये में से 24,000 करोड़ रुपये तो राज्य सरकारों को चले जाते हैं। साथ में राज्य सरकारें खुद भी पेट्रोलियम पदार्थों पर अपने शुल्क लगा कर 72,000 करोड़ रुपये वसूल करती हैं। तो मतलब यह कि केंद्र को तो मिले 84,000 करोड़ रुपये, और राज्य सरकारों को मिले 96,000 करोड़ रुपये। लेकिन विपक्ष को यह गणित समझ में नहीं आ रहा। भाजपा यही रट लगा रही है कि जनाब दाम बढ़ाने का फैसला तो 100% आपका था ना, फिर बदनामी तो 100% आपकी ही होगी! भाजपा से यह कहते नहीं बन रहा कि पेट्रोल-डीजल जैसी जरूरी चीजों पर इतना ज्यादा टैक्स ठीक नहीं है, उसे कम किया जाये। किस मुंह से कहे वह, आखिर उसने अपने राज में यह टैक्स घटाने के लिए क्या किया? खैर, वित्त मंत्री ने राज्य सरकारों को अभी 3 दिन पहले सुझाव भी दिया कि वे पेट्रोल-डीजल पर अपने शुल्क कम करें। मगर राज्यों का कहना है कि केंद्र अपने टैक्स घटाये। दिल्ली में पेट्रोल पर प्रति लीटर 25.01 रुपये के कुल टैक्स में से 14.78 रुपये एक्साइज के और 1.66 रुपये कस्टम के हैं। तो केंद्र और राज्यों के बीच पहले आप पहले आप का यह लखनवी अंदाज चलता रहेगा, मगर गाड़ी तो जनता की छूटेगी! (शेयर मंथन, 29 जुलाई 2010) |