
राजीव रंजन झा भारतीय शेयर बाजार को समझने, इससे फायदा लेने और इसे सहारा देने में घरेलू संस्थागत निवेशक (डीआईआई) अक्सर ज्यादा चतुर साबित होते रहे हैं।
लेकिन साथ ही हाल के वर्षों में यह भी अक्सर दिखता रहा है कि बाजार की दिशा मोटे तौर पर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की खरीदारी-बिकवाली पर ज्यादा निर्भर रहती है। अभी बीते 3 महीनों का ही लेखा-जोखा देखें तो एनएसई के आँकड़ों के मुताबिक मई महीने में एफआईआई ने नकद श्रेणी में शुद्ध रूप से करीब 12,000 करोड़ रुपये की बिकवाली की। इस बिकवाली के चलते निफ्टी इस 30 अप्रैल के 5278 से 31 मई को 5086 पर आ गया। इसी बीच में निफ्टी ने 4786 की तलहटी भी बनायी। गिरावट के इस दौर में घरेलू संस्थाएँ तकरीबन लगातार खरीदार बनी रहीं। उन्होंने इस दौरान 6300 करोड़ रुपये से ज्यादा की शुद्ध खरीदारी की। अगर उनकी बड़ी खरीदारी वाले दिनों को चुन कर निफ्टी के स्तर देखे जायें तो यह समझ में आता है कि उन्होंने ज्यादातर खरीदारी 5000 के आसपास या इससे भी नीचे की। लेकिन जून में तस्वीर बदली। एफआईआई खरीदार बन गये और शुद्ध रूप से करीब 7700 करोड़ रुपये की खरीदारी की। उनकी यह खरीदारी निफ्टी को 31 मई के 5086 से चढ़ा कर 30 जून को 5312 पर ले गयी। घरेलू संस्थाओं ने तुरंत पलटी मार कर मुनाफावसूली शुरू कर दी। जून में उन्होंने करीब 4800 करोड़ रुपये की बिकवाली की। उनकी यह ज्यादातर बिकवाली 5200-5300 के आसपास के स्तरों पर आयी। जुलाई में अब तक एफआईआई शुद्ध रूप से 8100 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी कर चुके हैं। उनकी इस खरीदारी से निफ्टी की पट्टी करीब 100 अंक ऊपर खिसकी और यह फिलहाल 5400 के आसपास मँडरा रहा है। लेकिन इस दौरान घरेलू संस्थाओं की बिकवाली जारी रही। वे इस महीने अब तक करीब 6200 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली कर चुकी हैं। अगर पिछले साल डेढ़ साल के रुझान की तरह ही निफ्टी यहाँ से एक बार फिर नीचे फिसले और 700-800 अंकों का गोता लगा ले, तो घरेलू संस्थाओं की अब तक की रणनीति बेहद सफल कही जायेगी। लेकिन अगर बाजार ने एकदम से तेजी का रुख पकड़ लिया तो एफआईआई ही ज्यादा चतुर साबित होंगे। देखते हैं कि एफआईआई और घरेलू संस्थाओं की रस्साकशी में बाजार इस बार किसका साथ देता है! (शेयर मंथन, 30 जुलाई 2010) (Keywords: Rajeev Ranjan Jha, DII, FII, Share Market, Stock Market, Investment, Nifty, NSE, Sensex, BSE) |