राजीव रंजन झा
कहीं पक्की खबर नहीं है, लेकिन कच्ची-कच्ची खबरों में कहा जा रहा है कि सरकार ओएनजीसी और गेल के जरिये कैर्न को खरीदने की होड़ में उतरने जा रही है।
मुझे तो यह कुछ-कुछ नदी की धारा पलटने जैसा लग रहा है। कहाँ तो सरकार को विनिवेश के रास्ते पर अपने कदम तेज करने चाहिए थे, वहीं अब यह उल्टे निजी कंपनी को खरीदने की तैयारी करती दिख रही है। शायद इसे एक अपवाद कहा जाये, शायद सरकार इस तरह की घटनाएँ दोहरायेगी नहीं। लेकिन कैर्न के मामले में ही क्यों? क्या यह निवेशकों के हितों या राष्ट्रीय हितों की चिंता के कारण किया जा रहा है? या फिर सरकार कॉर्पोरेट लड़ाई का मोहरा बन रही है? खबरों में यह बात पहले आ चुकी है कि कैर्न एनर्जी ने अपना हिस्सा बेचने के लिए पहले ही ओएनजीसी और रिलायंस से संपर्क किया था। लेकिन उस समय ओएनजीसी को प्रस्ताव आकर्षक नहीं लगा। तो अब वेदांत समूह के साथ कैर्न का सौदा होने के बाद ओएनजीसी को क्यों इसमें अचानक से दिलचस्पी होने लगी है? कैर्न इंडिया के सबसे प्रमुख ब्लॉक में ओएनजीसी की 30% हिस्सेदारी है। इस नाते उसे यह देखने का अधिकार है कि कैर्न का प्रबंधन उसके अनुकूल हाथों में रहे। लेकिन कैर्न एनर्जी के बदले वेदांत समूह के आ जाने से ओएनजीसी के हितों पर कौन-सा उल्टा असर पड़ने वाला है? अपनी मौजूदा हिस्सेदारी के आधार पर ओएनजीसी कह सकती है कि कैर्न एनर्जी का हिस्सा खरीदने का पहला अधिकार उसका है। लेकिन अगर कैर्न एनर्जी यह साबित कर दे कि उसने पहले ही ओएनजीसी से संपर्क किया था और तब ओएनजीसी ने मना कर दिया था, तब पहला अधिकार रखने के दावे का क्या होगा? शायद हम कैर्न इंडिया के मामले में कानूनी लड़ाई और कॉर्पोरेट दाँवपेंचों का एक नया अध्याय देखेंगे। लेकिन क्या यह अच्छा नहीं होगा कि सरकार अपने प्रभाव का इस्तेमाल आम निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए करे। जिस तरह से वेदांत समूह और कैर्न एनर्जी ने नॉन-कंपीट फी के नाम पर आम निवेशकों को छला है और उन्हें खुले प्रस्ताव (ओपन ऑफर) में कम भाव पर शेयर बेचने की तरकीब निकाली है, उस मामले में सरकार दखल दे। सरकार इन्हें मजबूर करे कि वेदांत समूह कैर्न एनर्जी को जो कीमत दे रहा है, वही कीमत आम निवेशकों को भी दे। लेकिन सरकार तो शायद किसी और खेल में उलझ गयी है। है ना उल्टा! (शेयर मंथन, 24 अगस्त 2010) |
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Last Updated ( Tuesday, 24 August 2010 09:53 )
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