राजीव रंजन झा
साल 2008 के अंतिम महीनों ने जिन बड़ी-बड़ी कंपनियों को गर्दिश में ला दिया, उनमें भारतीय कंपनियों के ज्यादा नाम नहीं थे। लेकिन एक बड़ा नाम था सुजलॉन (Suzlon) का।
जनवरी-मार्च 2008 में 482 करोड़ रुपये का स्टैंडअलोन तिमाही मुनाफा दिखाने वाली सुजलॉन अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में 391 करोड़ रुपये के घाटे में आ गयी थी। उस दौर में वैसे तो कोई दिग्गज शेयर 50% टूटा, कोई 90% तक। लेकिन बाकी दिग्गज शेयरों का धंधा नहीं टूटा था, सुजलॉन का धंधा ही टूट गया। इसीलिए आम तौर पर बाकी दिग्गज शेयर जहाँ बाजार सँभलने के साथ अच्छी तरह सँभल गये, लेकिन सुजलॉन ज्यादा नहीं उबर पाया। मार्च से जून 2009 की उछाल में इसने 33 रुपये की तलहटी से 146 रुपये तक की जबरदस्त वापसी की, लेकिन यह वापसी टिकाऊ नहीं रही। लगातार हर तिमाही में घाटे से निराश निवेशकों ने इससे मानो हाथ धो लिया। चाहे बुनियादी रूप से देखें या तकनीकी नजरिये से, सुजलॉन को बेहद कमजोर कहा जा सकता है। लेकिन क्या हम सुजलॉन को एकदम से नकार सकते हैं? ऐसा करने से पहले कुछ बातों का जवाब पाना होगा। क्या पवन ऊर्जा (विंड एनर्जी) की जरूरत खत्म हो गयी है? भविष्य में पवन ऊर्जा की खपत घटेगी या बढ़ेगी? इसी से संबंधित एक सवाल - कच्चे तेल का भाव से वापस 30-40-50 डॉलर प्रति बैरल की ओर जायेगा या 100 डॉलर की ओर? क्या पवन ऊर्जा के वैश्विक बाजार में सुजलॉन का नेतृत्व कमजोर पड़ रहा है? (ध्यान रखें कि ठेके कम मिलना अलग बात है और बाजार हिस्सेदारी गँवाना अलग बात।) अभी सुजलॉन की दो बड़ी दिक्कतें हैं – कर्ज का बोझ और नये ठेके कम मिलना। पहले मोर्चे पर कंपनी ने कई उपाय किये हैं, कर्जों के रीफाइनेंस की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जल्दी ही इसका असर दिखने की उम्मीद रखी जा सकती है। जहाँ तक नये ठेकों की बात है, तो याद रखें कि यूरोप कंपनी का मुख्य बाजार है, खास कर इसकी 90% सहायक कंपनी (सब्सीडियरी) रीपावर के लिहाज से। और यूरोप की अर्थव्यवस्था किधर जा रही है, इसके बारे में कोई भविष्यवाणी मेरे लिए संभव नहीं है। लेकिन अच्छी बात यह है कि सुजलॉन ने भारत, चीन, ब्राजील जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अपने कामकाज पर जोर बढ़ाया है। कंपनी को पश्चिमी यूरोप से भी उम्मीदें हैं, ज्यादा दिक्कत पूर्वी यूरोप में है। कंपनी अपने कर्ज संकट से बाहर आने लगे और कामकाजी तौर पर सुधार दिखे तो इस शेयर को लेकर बाजार में नया उत्साह बन सकता है। लेकिन ऐसा होने का पहला संकेत तब मिलेगा, जब कंपनी कम-से-कम एबिटा स्तर पर, यानी कामकाजी मुनाफे में लौट आये। गर तू हिम्मत ना हारे तो होंगे वारे-न्यारे! (शेयर मंथन, 03 सितंबर 2010) |
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Last Updated ( Friday, 03 September 2010 12:06 )
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