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भारतीय कार कंपनियों की बिक्री फिर से पाँचवें गियर में जाती लग रही है। इस क्षेत्र की मौजूदा स्थिति पर शेयर मंथन ने बातचीत की मारुति सुजुकी के पूर्व प्रबंध निदेशक और कारनेशन ऑटो इंडिया के संस्थापक सीएमडी जगदीश खट्टर से।
शेयर मंथन : भारतीय कार बाजार की मौजूदा बढ़ोतरी के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या यह उम्मीद के अनुरूप है या उससे बेहतर है? जगदीश खट्टर : किसकी उम्मीद! हर किसी की उम्मीद अलग-अलग होती है। हमें पूरी तस्वीर देखनी चाहिए, जो यह बताती है कि इस देश में अब भी बहुत कम लोगों के पास कार है। हमारी जनसंख्या एक अरब से ज्यादा है। इनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो कार नहीं रखना चाहे। सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति अपनी कार चाहता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उसके पास कार खरीदने और उसके बाद चलाने और रखरखाव करने की क्षमता है? कहने का मतलब यह है कि देश में कारों की मांग के लिहाज से अपार संभावनाएँ हैं। हमें अभी काफी लंबी दूरी तय करनी है। चीन में कारों की संख्या हमारी तुलना में तीन-चार गुनी है। यदि हम दस साल पहले की बात करें तो भारत और चीन दोनों एक जैसे स्तर पर थे। सारा कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कैसा रहता है, कार उत्पादक कंपनियाँ कैसा काम करती हैं और किस तरह के उत्पाद बाजार में लाती हैं। लेकिन कुल मिला कर देश में ऑटोमोबाइल उद्योग का भविष्य बेहतर लग रहा है। शेयर मंथन : मौजूदा हालात यह है कि कंपनियाँ मांग की तुलना में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में पिछड़ रही हैं। अगले कुछ सालों की तस्वीर कैसी लगती है? जगदीश खट्टर : सारी कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि आने वाले वक्त में कारों की कमी होगी। कुछ कंपनियों को भले ही क्षमता विस्तार में दिक्कत आ रही हो, लेकिन अन्य कंपनियाँ निश्चय ही अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। इसलिए करीब एक साल बाद कंपनियों की कुल क्षमता मांग के मुकाबले अधिक ही रहने की उम्मीद है। किसी मॉडल की बिक्री उम्मीद से बेहतर होने पर कुछ समय के लिए उस मॉडल की मांग पूरी करने में दिक्कत आ सकती है। लेकिन दूसरे मॉडल तो उपलब्ध रहेंगे ही।
शेयर मंथन : लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि कार कंपनियों को पहले ही मांग में ऐसी बढ़ोतरी का अनुमान होने चाहिए था और उन्हें उसके हिसाब से मांग को पूरा करने की तैयारी रखनी चाहिए थी? जगदीश खट्टर : आज मांग में तेजी सबको दिख रही है। लेकिन 2-3 साल पहले के हालात याद करें। मान लें एक साल बाद किसी वजह से कारों की मांग कम हो जाये और उत्पादन क्षमता उसके मुकाबले अधिक हो, तब लोग पूछेंगे कि उत्पादन क्षमता इतनी क्यों बढ़ा ली? हमारी एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और कंपनियाँ अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रही हैं। हो सकता है कि कभी छोटी अवधि के लिए मांग और आपूर्ति में कुछ फर्क रह जाये। आप केवल पिछले चार महीनों की तेजी देख रहे हैं। लेकिन तीन सालों का औसत देखना चाहिए। साल 2008-09 में बिक्री बढ़ने की दर कम थी। जिन ग्राहकों को उस दौरान खरीदारी करनी चाहिए थी लेकिन उन्होंने तब नहीं खरीदा, वे आज बाजार में आ रहे हैं। यही नहीं, बिक्री बढ़ने की दर इस बात पर भी निर्भर करती है कि आधार क्या है, यानी जिस पिछली अवधि से तुलना कर रहे हैं, तब बिक्री कितनी थी। शेयर मंथन : कुछ समय पहले तक हर कंपनी मार्जिन को ले कर चिंतित थी। इस समय स्थिति कैसी लग रही है? जगदीश खट्टर : यूरोप और अमेरिका की कार कंपनियों को जितना मार्जिन मिल रहा है, उसके मुकाबले भारतीय कार कंपनियाँ काफी अधिक फायदे पर चल रही हैं। शेयर मंथन : लेकिन क्या हालात पिछले साल के मुकाबले सुधरे हैं? जगदीश खट्टर : निश्चित तौर पर। लेकिन मार्जिन का मतलब क्या होता है? यह आपकी उत्पादन लागत और आमदनी पर निर्भर है। आपकी उत्पादन लागत पर कमोडिटी की कीमतों का असर पड़ता है। मार्जिन बढ़ाने के कई तरीके होते हैं। आप बिक्री की कीमत वही रख रखते हुए भी मार्केटिंग खर्च कम करके अपना मार्जिन बढ़ा सकते हैं। आप सेल्स प्रमोशन कम करके ज्यादा मार्जिन पा सकते हैं। (जगदीश खट्टर से शेयर मंथन ने कई और महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी बात की है। हम आगे की बातचीत कल पेश करेंगे।) (शेयर मंथन, 23 जून 2010) |