|
भारतीय कारों का निर्यात हाल में अच्छी रफ्तार से बढ़ा है। इस क्षेत्र में भारत के सामने मौजूद अवसरों और चुनौतियों पर शेयर मंथन ने बातचीत की मारुति सुजुकी के पूर्व प्रबंध निदेशक और कारनेशन ऑटो इंडिया के संस्थापक सीएमडी जगदीश खट्टर से।
हमने उनसे यह भी समझना चाहा कि वैकल्पिक ऊर्जा पर चलने वाली कारों का बाजार कैसा हो सकता है। शेयर मंथन : देश की कई कार उत्पादक कंपनियों की कुल बिक्री में निर्यात की हिस्सेदारी अब अच्छी-खासी हो चली है। क्या आपको लगता है कि आने वाले वक्त में निर्यात बाजार इन कंपनियों के लिए बड़े अवसर के तौर पर उभरेगा? जगदीश खट्टर : मैंने हमेशा यह बात कही है कि भारत कॉम्पैक्ट कारों के निर्यात का केंद्र बन सकता है। व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह मानना है कि तीन-चार सालों बाद हम सालाना 10 लाख कारों का निर्यात कर सकते हैं। शेयर मंथन : विभिन्न कार निर्माताओं की निर्यात रणनीतियों के बारे में आप क्या सोचते हैं, खास तौर पर मारुति की रणनीति के बारे में? जगदीश खट्टर : भारत की कार कंपनियाँ अपनी मूल कंपनी के वितरकों के जरिये कारों का निर्यात कर रही हैं। जैसे, मारुति अपना निर्यात सुजुकी के वितरकों के जरिये कर रही है। इसी तरह ह्यूंदै का निर्यात ह्युंदै के वितरकों के माध्यम से हो रहा है। जहाँ इनकी मूल कंपनियों के वितरक नहीं हैं, उन्हीं देशों में ये कंपनियाँ खुद जा रही हैं। लेकिन मोटे तौर पर हमारे यहाँ की कंपनियां इन वितरकों के जरिये ही निर्यात कर रही हैं। जरा इसको समझें। मान लें कि मैं यूरोप में सुजुकी का एक वितरक हूँ। मेरे पास कुछ कारें जापान से आती हैं, कुछ कारें सुजुकी के यूरोप के संयंत्रों से आती हैं और भारत से ऑल्टो आती है। लेकिन शोरूम वही है। ऐसे में जब कोई ग्राहक आता है तो उसे विभिन्न देशों से मंगायी गयी विभिन्न कारें दिखती हैं। ऐसे में आपको किसी खास रणनीति की जरूरत नहीं है। रणनीति वे लोग बनाते हैं, जो उन देशों में मार्केटिंग और वितरण से जुड़े हुए हैं। हमारे यहाँ के अधिकांश कार निर्यातक केवल कारें बना कर अपनी मूल कंपनियों को भेज दे रहे हैं। शेयर मंथन : अभी भी वैश्विक स्तर पर भारतीय कार निर्माताओं की बाजार हिस्सेदारी काफी कम है। आपकी राय में ऐसे कौन-से कदम उठाने होंगे जिनसे भारत वैश्विक स्तर पर एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभर सके? जगदीश खट्टर : हमने अभी तो निर्यात करना शुरू किया है। हमें काफी वक्त लगेगा और मैं नहीं मानता कि हमें इस बाजार में ज्यादा बड़ा हिस्सा मिल सकेगा। हमें इसके बारे में सपने नहीं देखने चाहिए। ऐसा कुछ होने में 15 साल लगेंगे। यह आसान काम नहीं है। हमारा निर्यात इस पर निर्भर होता है कि हमारा घरेलू बाजार कितना बड़ा है। हमारे घरेलू कार बाजार का आकार 15 लाख कारों का है। लेकिन दुनिया में दसियों ऐसी बड़ी कंपनियाँ हैं जो साल भर में 10 लाख से अधिक कारें बनाती हैं। हमारे उत्पादन में 70% हिस्सा कॉम्पैक्ट कारों का है। इसीलिए हम केवल कॉम्पैक्ट कारों का ही निर्यात करते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉम्पैक्ट कारों की हिस्सेदारी काफी कम है। इसलिए भारत के बड़े निर्यातक बनने में काफी लंबा वक्त लग सकता है। पिछले साल चीन का कार बाजार अमेरिका के बाजार की बराबरी पर पहुँच गया है। इसके बावजूद चीन का निर्यात भारत से कम है, जबकि उनका घरेलू बाजार हमसे 6 गुना बड़ा है। निर्यात इतना आसान नहीं होता और मेरा मानना है कि भारत इस क्षेत्र में लोगों की उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। शेयर मंथन : अब तक भारत ने निर्यात बाजार में खुद को कम लागत में छोटी कारें बनाने वाले देश के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। क्या आपको लगता है कि लंबी अवधि में यह रणनीति फायदेमंद साबित होगी? जगदीश खट्टर : इस बाजार में घुसने का यही एकमात्र रास्ता है। हम बड़ी कारें नहीं बनाते। इसलिए बड़ी कारों की हमारी लागत अधिक होगी और हम इसे निर्यात बाजार में बेच नहीं पायेंगे। हम केवल वैसी कारें ही निर्यात कर सकते हैं जिनमें हमें कम लागत का फायदा मिल रहा हो। शेयर मंथन : कुछ कंपनियों ने इलेक्ट्रिक कारों और हाइब्रिड कारों का उत्पादन शुरू किया है। क्या आपको लगता है कि आने वाले सालों में ऐसी कारों का एक बड़ा बाजार बन सकता है? जगदीश खट्टर : नहीं, निकट भविष्य में नहीं। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत अधिक लागत की है। और फिर आप बतायें कि हमारे यहाँ बिजली की कमी है या नहीं? जब कमी है तो बिजली का इस्तेमाल उद्योगों और खेती के लिए करना चाहिए या कारें चलाने के लिए? उद्योग अपने संयंत्रों को चलाने के लिए 10 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से अपने जेनरेटर चला रहे हैं। क्या बिजली के वितरण में उनको प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए? जब बिजली की कमी है, तो इसकी आपूर्ति पर और अधिक दबाव डालने की क्या जरूरत है? शेयर मंथन : यदि हम दूसरे पर्यावरण-मित्र विकल्पों को देखें, तो सौर ऊर्जा से चलने वाली कारें अभी प्रयोगशाला में हैं। क्या हम इन कारों को जल्दी ही सड़कों पर दौड़ती देख सकेंगे? जगदीश खट्टर : इसमें अभी वक्त लगेगा। और, मुझे नहीं लगता कि हमें इनके बारे में अधिक चिंता करने की जरूरत है। इनके विकास का जिम्मा बड़े खिलाड़ियों पर छोड़ देना ही ठीक रहेगा। क्या आप जानते हैं कि ऑटो क्षेत्र के दिग्गजों का शोध-विकास (आरएंडडी) बजट कितना होता है? पाँच-सात अरब डॉलर तक। उनकी बराबरी कैसे की जा सकती है? हमारे यहाँ इतनी क्षमता नहीं है। सारा शोध वही लोग कर रहे हैं। बेहतर यही होगा कि वे शोध करें, ऐसी कारों को विकसित करें और उन्हें बाजार में उतारें। हमारे देश की तमाम कंपनियाँ इन दिग्गजों से जुड़ी हुई हैं, इसलिए तब स्वाभाविक तौर पर ये कारें भारत में भी आ जायेंगी। (शेयर मंथन, 24 जून 2010) |
|
Last Updated ( Thursday, 24 June 2010 17:02 )
|