Home विशेष बातचीत घरों की मांग में 25-30% बढ़त : राजीव तलवार (Rajeev Talwar)
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घरों की मांग में 25-30% बढ़त : राजीव तलवार (Rajeev Talwar) Print E-mail

देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ (DLF) का मानना है कि आने वाले वर्षों में घरों की मांग काफी अच्छी बनी रहेगी। दरअसल रियल एस्टेट कंपनियों को मंदी से उबारने में आवासीय (Residential) क्षेत्र की ही सबसे प्रमुख भूमिका रही है। लेकिन डीएलएफ समूह के कार्यकारी निदेशक राजीव तलवार (Rajeev Talwar, Group ED, DLF) का कहना है कि अगर सरकार ने नयी परियोजनाओं की मंजूरी और ब्याज दरों को सस्ता रखने की ओर ध्यान नहीं दिया तो अगले कुछ सालों में फिर से कीमतों का बुलबुला बन सकता है। रियल एस्टेट क्षेत्र की मौजूदा स्थिति के बारे में राजीव तलवार से एक खास बातचीत की शेयर मंथन ने। आज पेश है इस बातचीत का आवासीय श्रेणी से संबंधित हिस्सा।

शेयर मंथन: हाल में घरों की मांग कुछ सुधरी है। मांग में यह सुधार कितना दमदार और टिकाऊ है?
राजीव तलवार: मांग तो काफी दमदार है। यह देश काफी तेज विकास के रास्ते पर लौट रहा है। इसलिए अगर भारत की सालाना विकास दर 8% या 9% मानें तो अब तक के अनुभव के हिसाब से रियल एस्टेट क्षेत्र के बढ़ने की दर इसकी ढाई गुणा होनी चाहिए। इसके अनुसार यह क्षेत्र 20% से 25% की दर से बढ़ना चाहिए। इससे आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। साथ में यह देखें कि देश में करीब 2.5 करोड़ घरों की कमी है। इनमें से 90% सस्ते घरों (एफोर्डेबल हाउसिंग) की श्रेणी में होंगे। इसलिए मांग काफी ज्यादा रहने की उम्मीद है। इस मांग के बाजार में आने से आर्थिक विकास को भी नयी गति मिलेगी। घरों की मांग अगले एक या दो दशकों तक काफी मजबूत बनी रहने की उम्मीद है। अगर भारत के आर्थिक विकास को कोई झटका लग जाये, तभी इसमें फर्क आ सकता है।
शेयर मंथन: लेकिन आवासीय क्षेत्र (रेजिडेंशियल सेग्मेंट) के ग्राहकों को खींचने में आपका प्रदर्शन क्या पूरे रियल एस्टेट क्षेत्र की तुलना में ज्यादा बेहतर रहा है?
राजीव तलवार: ग्राहकों को आकर्षित करने में डीएलएफ पारंपरिक रूप से आगे रही है। और हम किसी दूसरे से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन करने की होड़ में नहीं रहते। हम इस क्षेत्र में हर किसी के साथ मिल कर काम करना चाहते हैं। हमारे चेयरमैन ने कई बार कहा है कि इस देश में डीएलएफ जैसी 100 कंपनियाँ हों, तब तक जाकर हमारी 1.2 अरब आबादी की जरूरतें पूरी हो सकेंगीं। इस आबादी की जरूरतें पूरी करना और हर भारतीय के सिर पर छत मुहैया कराना सबकी जिम्मेदारी है, चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय या हमारे जैसी कंपनियाँ।
शेयर मंथन: क्या मांग में सुधार पूरे आवासीय क्षेत्र में दिख रही है, या केवल सस्ते घरों की श्रेणी में?
राजीव तलवार: यह सुधार तो पूरे क्षेत्र में ही होगा। घर सबके लिए एक जरूरत है। अपना घर होना न केवल भावनात्मक सुरक्षा देता है, बल्कि यह ऐसी संपत्ति है जिसकी लोग आकांक्षा रखते हैं। अपने सिर पर महज एक छत चाहने वाले सबसे गरीब व्यक्ति से लेकर आर्थिक प्रगति कर रहे हर व्यक्ति के लिए जीवन की एक बड़ी प्राथमिकता होती है कि वह एक ज्यादा आरामदायक घर में चला जाये। यह बात सबसे धनी वर्ग के लिए भी सही है, जहाँ लोग प्रीमियम, लक्जरी, अल्ट्रा-लक्जरी जैसे बेहद खर्चीले घर, बड़े घर और बेहतर परिवेश की चाहत रखते हैं। इसलिए यह तो मान कर चल सकते हैं कि आवासीय क्षेत्र के हर हिस्से के लिए हमेशा ही मांग रहेगी।
शेयर मंथन: लेकिन आप कहाँ ज्यादा ध्यान दे रहे हैं?
राजीव तलवार: डीएलएफ का इतिहास देखें तो हमने (आजादी के ठीक बाद) दिल्ली आने वाले शरणार्थियों के लिए कॉलोनियाँ बसायी। कई पीढ़ियों बाद हमने गुड़गाँव उपनगर बसाया, जहाँ हम समाज के हर वर्ग के लिए काम कर रहे हैं। इनमें समाज के सबसे कमजोर वर्ग भी हैं और सबसे संपन्न वर्ग भी। हमारा काम बाजार के ऊपरी वर्ग में ज्यादा है, लेकिन हमारा ध्यान इस क्षेत्र की सभी श्रेणियों की मांग पर है।
शेयर मंथन: किस श्रेणी में मांग ज्यादा सुधरी है?
राजीव तलवार: आवासीय क्षेत्र में साल भर पहले की तुलना में मांग अभी 25-30% बढ़ी है। जैसे-जैसे लोगों को अपनी नौकरियाँ ज्यादा सुरक्षित लगेंगी, उनके वेतन-भत्ते बढ़ेंगे, वैसे-वैसे मांग और बढ़ेगी। हालाँकि मांग ज्यादा आने की असली उम्मीद सस्ते घरों की श्रेणी में है, बशर्ते सरकार भूमि की लागत घटा दे या लगभग खत्म कर दे। घरों की कुल कीमत में भूमि की लागत का हिस्सा करीब 30% होता है। इसी तरह कीमत का करीब 30% हिस्सा करों (टैक्स) का होता है। अगर सरकार इन दोनों की लागत घटाने के उपाय करे तो हम सस्ते घरों की मांग में काफी बढ़ोतरी होती देखेंगे। अगर ऐसा नहीं होता, तब हमारा असली मार्जिन केवल प्रीमियम और लक्जरी घरों की श्रेणी में ही रहेगा।
शेयर मंथन: अगर वितरण (डिलीवरी) के पैमाने पर देखा जाये तो किस श्रेणी में ज्यादा सुधार दिखता है?
राजीव तलवार: रियल एस्टेट क्षेत्र में वितरण (डिलीवरी) के लिहाज से काफी सुधार आया है और देश में क्षमता काफी बढ़ी है। जब धीमापन आया तो देश भर में काफी परियोजनाएँ अटक गयीं। दरअसल नयी परियोजनाएँ तो लगभग नहीं के बराबर रह गयीं। इस क्षेत्र की हर कंपनी और यहाँ तक कि राज्यों के प्राधिकरणों (अथॉरिटी) और स्थानीय निकायों (लोकल बॉडी) ने भी उस धीमेपन के दौरान केवल निर्माण पर अपना ध्यान रखा। इसलिए निकट भविष्य में, अगले 1-2 सालों में हम देश भर में काफी बड़ी संख्या में वितरण (डिलीवरी) देखेंगे। यही कहानी डीएलएफ की भी रहेगी।
लेकिन आगे इस बढ़त के जारी रहने के लिए जरूरी है कि हर स्थानीय निकाय, राज्य सरकार और केंद्र सरकार अगले 1-2 सालों में अधिक-से-अधिक संख्या में नयी परियोजनाओं को मंजूर करे। न केवल उन्हें मंजूरी मिले, बल्कि उन्हें वित्तीय समापन (फाइनेंशियल क्लोजर) के स्तर तक पहुँचाया जाये। इसके लिए जरूरी होगा कि कम ब्याज दरों के दौर में वापस लौटा जाये और इन नयी परियोजनाओं पर जल्दी अमल शुरू हो। यही एकमात्र रास्ता है, जिससे घरों की कीमतें सस्ती बनी रह सकेंगी। ऐसा नहीं होने पर फिर से बुलबुला बनेगा। लेकिन यह कीमत का बुलबुला नहीं होगा, बल्कि आपूर्ति के मांग से पीछे रह जाने का नतीजा होगा। भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को इस पर गंभीरता से सोचना होगा।
शेयर मंथन: लेकिन अभी डीएलएफ के आँकड़े क्या कह रहे हैं?
राजीव तलवार: हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि अगले 2-3 सालों में करीब 1 करोड़ वर्ग फुट का विकास कर सकें।
शेयर मंथन: इस समय आपकी कुल आय में आवासीय क्षेत्र की हिस्सेदारी कितनी है? पिछले 2-3 सालों की तुलना में इसका योगदान कितना बदला है?
राजीव तलवार: अब आवासीय क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ गयी है। अगर 2-3 साल पहले की स्थिति देखें तो उस समय व्यावसायिक (कमर्शियल) क्षेत्र में किराये (लीजिंग) और बिक्री दोनों के लिहाज से काफी तेजी आयी थी। उस समय खुदरा (रिटेल) क्षेत्र उफान पर था। लेकिन धीमापन आने के बाद अब आवासीय क्षेत्र में ही टिकाऊ रूप से बढ़त दिख रही है। लिहाजा इसकी हिस्सेदारी बढ़ना स्वाभाविक है। इस समय आवासीय क्षेत्र का योगदान 55-60% है। व्यावसायिक क्षेत्र 25-30% का योगदान कर रहा है और अब इसमें कुछ सुधार दिखने लगा है। बाकी बचा सबसे छोटा हिस्सा खुदरा क्षेत्र का है।
शेयर मंथन: सस्ते घरों का मतलब हर रियल एस्टेट कंपनी के लिए कुछ अलग होता है। डीएलएफ के लिए सस्ते घरों की परिभाषा क्या है?
राजीव तलवार: सस्ते घरों का मतलब हर कंपनी के हिसाब से अलग-अलग नहीं होता है, बल्कि जगह-जगह के हिसाब से अलग होता है। सुपर-मेट्रो में भूमि काफी महँगी है, इसलिए वहाँ 50-60 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के घर भी सस्ते कहे जायेंगे। सुपर मेट्रो में भूमि की उपलब्धता सरकार के हाथों में है और सरकारी प्राधिकरण चाहते हैं कि उनकी भूमि काफी महँगे भावों पर निकले। इसके लिए वे नीलामी करते हैं। नीलामी करने का एक कारण पारदर्शिता रखना भी है। लेकिन इसके चलते भूमि काफी महँगी हो जाती है। लिहाजा उन स्थानों पर बनने वाले सस्ते घरों की कीमत भी काफी ऊँची हो जाती है। छोटे शहरों में, जैसे दूसरी या तीसरी श्रेणी के शहरों में सस्ते घर 20 लाख रुपये तक के हैं। पहली श्रेणी और महानगरों में सस्ते घर 20-30 लाख रुपये के बीच के हैं।
शेयर मंथन: क्या आप 15 लाख रुपये तक की कीमत वाली श्रेणी में कदम रखने की सोच रहे हैं?
राजीव तलवार: आपको जान कर ताज्जुब होगा कि गुड़गाँव में हम 1.5 लाख रुपये कीमत वाले 1200 घर बना रहे हैं। ये घर उन लोगों को दिये जायेंगे जो हरियाणा सरकार के नियमों के मुताबिक आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हैं। इसलिए विभिन्न शहरों में 1.5 लाख रुपये से 15 लाख रुपये के बीच के घर बनाने की संभावना बनती है। जहाँ भी हमें इसका मौका मिलेगा, वहाँ हम ऐसा करेंगे। इस श्रेणी में नहीं होने का सवाल नहीं है और हम अपने दायित्वों को पूरा करेंगे।
शेयर मंथन: लेकिन क्या आपने अभी अपनी कोई परियोजना 10-15 लाख रुपये कीमत की श्रेणी में शुरू की है, या निकट भविष्य में करने जा रहे हैं?
राजीव तलवार: नहीं, अभी ऐसी कोई परियोजना नहीं है। हम सरकारी नियमों के मुताबिक अपने दायित्वों के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सरकार की ओर से तय कीमत पर घर बनाते हैं। या फिर अगर सरकार अतिरिक्त एफएसआई की अनुमति देती है, तब भूमि की लागत कम होने के चलते 10-15 लाख रुपये की श्रेणी में घर बनाये जा सकते हैं।
शेयर मंथन: तो इस समय आपकी परियोजनाओं में सस्ते घरों की किस श्रेणी में सबसे ज्यादा बिक्री हो रही है?
राजीव तलवार: जहाँ भी जरूरत दिखती है, वहाँ हम सस्ते घरों की परियोजनाएँ शुरू करते हैं। यह कीमत के किसी भी दायरे में हो सकती है। जैसे 22 लाख रुपये से शुरू होने वाले घर भी हैं। कहीं यह कीमत 35-45 लाख रुपये है और ऊपर 70 लाख रुपये या 1 करोड़ रुपये तक चली जाती है। यह हर शहर और उस परियोजना के स्थान पर निर्भर करता है। (शेयर मंथन, 28 अगस्त 2010)

Last Updated ( Saturday, 28 August 2010 18:00 )
 

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