ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा (Narendra Taneja) का कहना है कि रिलायंस को जल्दी ही 15-20 क्यूबिक ट्रिलियन फीट का बड़ा गैस भंडार मिलने का अनुमान है। हालाँकि उनके मुताबिक यह केवल वैज्ञानिकों की अटकलें हैं और इनकी पुष्टि होनी बाकी है। शेयर मंथन के राजीव रंजन झा से बातचीत में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि रिलायंस तेल खोज और उत्पादन के साथ-साथ शैल गैस के क्षेत्र में अधिग्रहण के लिए बाजार में है। सुनें यह पूरी बातचीत।
राजीव रंजन झा: सबसे पहले तो यह समझना चाहूँगा कि रिलायंस के नतीजों पर आप की पहली प्रतिक्रिया क्या है? नरेंद्र तनेजा: मुझे लगता है कि अगर आप हालात को देखें और इस बात को नजर में रखें कि पिछले दो साल में रिलायंस खास तौर से डी-6 ब्लॉक को लेकर काफी परेशानियों से होकर गुजरी है। उसके हिसाब से अगर सब कुछ आप देखते हैं तो मुझे लगता है कि नतीजे अच्छे हैं। और ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (जीआरएम) भी जितनी मैं उम्मीद कर रहा था, उससे बेहतर है। ये जो दो हिस्से हैं, खोज और उत्पादन (एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन) का कारोबार और रिफाइनिंग का कारोबार, वह इनके कुल कारोबार का लगभग 66% है। अगर इन सबको देखते हैं तो नतीजे मेरे हिसाब से अनुमान के मुताबिक ही हैं। अगर इससे ज्यादा उम्मीद की जा रही थी तो मुझे लगता है कि वह उम्मीद हकीकत के पास नहीं थी। इन हालात के अंदर, भारत में कुल मिलाकर जो तेल और गैस क्षेत्र की बाधाएँ, राजनीति, नीतिगत मुद्दे वगैरह मिलाकर और तेल-गैस के अंतरराष्ट्रीय बाजार के परिप्रेक्ष्य में देखें तो नतीजे काफी बेहतर हैं। राजीव रंजन झा: बाजार में दो चर्चाएँ खास तौर पर थी कि शायद गैस उत्पादन बढ़ाने का फैसला हो सकता है या संकेत आ सकता है। दूसरे, कोई बड़ा फैसला किसी अन्य कारोबार के संदर्भ में, कोई अधिग्रहण या इस तरह का संकेत। लेकिन ऐसी कोई बात इन नतीजों में सामने नहीं आयी है। नरेंद्र तनेजा: देखें जहाँ तक उत्पादन बढ़ाने की बात है डी-6 गैस का, वह खाली रिलायंस पर निर्भर नहीं करेगा। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए रिलायंस लगभग तैयार है, सक्षम है और जो कुछ थोड़े और निवेश की आवश्यकता थी वह लगभग किया जा चुका है। मशीनें पहुँच रहीं हैं, बुनियादी ढाँचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) विकसित हो रहा है। लेकिन अब ये तो सरकार तय करती है कि उस गैस का प्रयोग कौन करेगा। सरकार की नीति जो है, अब भी मुझे ऐसा लगता है कि इतनी स्पष्ट नहीं है कि रिलायंस बहुत उत्साहित होकर उत्पादन बढ़ाने में लग जाये। जब तक सरकार की नीति में बहुत स्पष्टता नहीं आती, जैसे अभी सरकार ने कहा है कि 2013 तक भारत में गैस की भारी किल्लत होने वाली है। दूसरा ये वक्तव्य आया कि गैस की एक नीति होगी। जितनी भी गैस है, उसके लिए आज की तारीख में कम-से-कम पांच अलग-अलग मूल्य (प्राइस बैंड) चलते हैं। सरकार ने कहा है कि 5-6 महीनों के अंदर इसका एक दायरा (बैंड) बना दिया जायेगा। अगर ऐसी कुछ बातें होती हैं तो मुझे लगता है कि कंपनी उससे प्रोत्साहित होगी और वह उत्पादन और ज्यादा बढ़ायेगी। गैस तो उन्हीं के पास है, गैस तो कहीं जानी है नहीं। और यह भी सबको पता है कि आने वाले समय के अंदर गैस हो या तेल हो, सबकी कीमतें ऊपर जानी है। मुझे लगता है कि बहुत सारे कारक (फैक्टर) होते हैं। जहाँ तक बात हुई कि कोई बहुत बड़ा वक्तव्य नहीं आया, तो मुझे नहीं लगता है कि आने वाले 2-3 साल के अंदर रिलायंस तेल-गैस और शायद परमाणु ऊर्जा (न्यूक्लियर पावर) के अलावा कहीं और भारी मात्रा में निवेश करने वाली है। रिटेल में उनकी दखल बनी रहेगी, लेकिन रिटेल में वो बहुत वो ज्यादा बड़ा आकार हासिल करने का प्रयास करेंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता है। हॉस्पिटैलिटी कारोबार में उन्होंने दिलचस्पी दिखायी है। मुझे लगता है कि इसमें छोटे-छोटे कदम (बेबी स्टेप्स) लिये जा रहे हैं और उसको सीखा जा रहा है। जिस क्षेत्र में मुझे लगता है कि थोड़ा आगे आक्रामक तरीके से आयेंगे, वह इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्षेत्र है, जैसे वायरलेस ब्राडबैंड। मुझे लगता है कि तेल-गैस के बाद जिस क्षेत्र में उनकी काफी दिलचस्पी है और जिसमें उनका आकार बड़ा होने वाला है, वह वायरलैस ब्राडबैंड का क्षेत्र होगा। इसके अलावा मेरा व्यक्तिगत मानना है कि भारत में जिस हिसाब से विकास हो रहा है, उसमें आज सबसे बड़ा फायदा (रिटर्न) ऊर्जा क्षेत्र (एनर्जी सेक्टर) में मिलता है। ऊर्जा में भी खास तौर से तेल-गैस में। मुझे लगता है कि आने वाले समय में भी उनका मुख्य ध्यान तेल-गैस क्षेत्र पर ही रहेगा, उसी में खुद को और जमायेंगे। जिस हिसाब से भारत में माँग बढ़ रही है, और पश्चिम के देशों में भी बढ़ सकती है, खास तौर से अमेरिका के बाजार में उनकी दिलचस्पी है, शैल (Shale) गैस में काफी दिलचस्पी है, तो मुझे लगता है कि उसी में खुद को जमायेंगे। जो भी निवेशक रिलायंस पर नजर रखता है और रिलायंस को अपनी मंजिल बनाता है तो मुझे लगता है कि उसको छोटी अवधि के लिए नहीं लेना चाहिए, क्योंकि रिलायंस के असली रिटर्न आज से लगभग दो-ढाई साल आने शुरू होंगे। राजीव रंजन झा: अगर गैस उत्पादन की बात करें, या जैसा आपने शैल गैस का जिक्र किया, उन दोनों में क्या कुछ बड़ी घोषणाएँ आगे हो सकती हैं? नरेंद्र तनेजा: हाँ, मुझे ऐसा लगता है कि दो क्षेत्र में बड़ी घोषणाएँ हो सकती हैं। एक तो शैल गैस, क्योंकि अभी रिलायंस के पास काफी भारी मात्रा में नकदी है। मुझे लगता है कि वे बाजार में हैं और बाजार में दो चीजों की तलाश चल रही है। शैल गैस का एक और भारी निवेश जल्दी हो सकता है और मुझे लगता है कि वह शायद उत्तरी अमेरिका में ही होगा। और दूसरा, जिसके लिए बाजार में खबरें हैं, अटकले कहूँगा, वो ये है कि रिलायंस इस कोशिश में है कि मध्यम आकार की कोई तेल खोज और उत्पादन (एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन) की कंपनी, जिसमें पहले ही उत्पादन होता हो, उसके लिए बाजार में तलाश जारी है। ऐसी कंपनी जिसे वे 5-10 अरब (बिलियन) डॉलर में खरीद सकें, उसकी तलाश जारी है। जैसे ही उस तरह की कंपनी रेडार पर आती है और उनको वो ठीक लगती है तो मुझे लगता है कि वहाँ ये बिल्कुल निवेश करना चाहेंगे। अब भारत के साथ-साथ रिलायंस विदेश में भी जाकर करके अच्छा पोर्टफोलिओ बनाना चाहती है। उनका यह प्रयास है कि तेल-गैस के क्षेत्र में खाली भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में एक वैश्विक पकड़ (ग्लोबल फुटप्रिंट) बना सकें। उस दिशा में यह कंपनी बढ़ रही है। जैसा मैंने कहा कि एक मध्यम आकार की खोज-उत्पादन कंपनी इनके रेडार पर है, और दूसरे शैल गैस की कुछ संपत्तियाँ उन्होंने खरीदी हैं, लेकिन अभी मुझे लगता है कि उत्तरी अमेरिका में एकाध और शैल गैस संपत्ति खरीदेंगे। राजीव रंजन झा: शैल गैस के कारोबार को जरा समझायें कि ये किस तरह सामान्य प्राकृतिक गैस से अलग होता है। यह कारोबार किस तरह होता है और इसमें फायदा क्या है? नरेंद्र तनेजा: दरअसल अमेरिका की अभी तक मध्य-पूर्व पर, जहाँ पर ईरान-इराक है, उसके ऊपर उनकी निर्भरता काफी थी। एक बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत वे यह कोशिश कर रहे हैं कि जो निर्भरता मध्य-पूर्व पर है, ईरान-इराक सब पर कम हो सके। इसलिए उन्होंने अपने ही देश में गैस की खोज शुरू की और वहाँ उनके वैज्ञानिकों ने शैल गैस खोजी, जिसको मैं हिंदी में कहूँ तो यह चट्टानी गैस है। यह ऐसी गैस है जो दो चट्टानों के बीच में फंसी हुई होती है। अब तक वह तकनीक उपलब्ध नहीं थी जिससे चट्टान को भेद करके उस गैस को बाजार तक लाया जा सके। अब भी वह तकनीक 100 फीसदी विकसित नहीं हुई है, लेकिन 80 फीसदी तक हो चुकी है। उसकी पहल अमेरिका में हुई है। अमेरिका में इस चट्टानी गैस के या शैल गैस के काफी बड़े भंडार है। चूँकि अमेरिका नहीं चाहता कि उसकी निर्भरता मध्य-पूर्व पर ज्यादा रहे, इसलिए उन भंडारों को विकसित करने में अरबों डॉलर खर्च किये जा रहे हैं। अमेरिकी सरकार चाहती है कि उन भंडारों का विकास हो और वही गैस अमेरिका का उपभोक्ता उपयोग करे। अमेरिकी कंपनियाँ भी उसमें जा रहीं हैं और दुनिया भर की तमाम कंपनियाँ भी उसमें जाना चाहती हैं, जिनमें भारत की रिलायंस भी शामिल है। एक बात और मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि जो शैल गैस के क्षेत्र में आने वाले समय में भारत में भी संभावनाएँ हैं, खास तौर से बिहार में और पूर्वी उत्तर प्रदेश में। उसके साथ-साथ कोंकण और गुजरात के कुछ इलाकों में भी इसके भी भंडार है। आने वाले समय में शैल गैस के माध्यम से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और गुजरात शैल गैस के नक्शे पर उभरने वाले हैं। वहाँ काफी गतिविधियाँ होंगी। इससे वहाँ का आर्थिक परिदृश्य बदल सकता है। राजीव रंजन झा: किसी नयी खोज की उम्मीद गैस क्षेत्र में? नरेंद्र तनेजा: हाँ, ऐसी अटकलें हैं कि रिलायंस शायद बहुत जल्द वो 15 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से 20 ट्रिलियन क्यूबिक फीट की नयी खोज कर सकती है। अभी ये अटकलें हैं। वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि जिस इलाके में आजकल रिलायंस गैस की खोज कर रही है, वहाँ 15 से 20 ट्रिलियन क्यूबिक फीट के भंडार हैं, वो भंडार जल्दी इनके हाथ लग सकते हैं। ठीक उसी तरीके से सरकारी कंपनी ओएनजीसी के लिए भी इस तरह के भंडारों की बात हो रही है। वे इतने बड़े नहीं हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि वे भंडार भी 7 से 9 ट्रिलियन क्यूबिक फीट के हैं। बंगाल की खाड़ी के लिए कहा जाता है कि वह गैस पर तैर रही है। जो दो कंपनियाँ इसका फायदा उठा सकती हैं, जिनको ये भंडार मिल सकते हैं, वे यही कंपनियाँ हैं – निजी क्षेत्र में रिलायंस और दूसरी ओएनजीसी। लेकिन यहाँ इस बात को दोबारा कहना चाहूँगा कि ये अटकलें हैं। जो वैज्ञानिक इस बारे में अच्छी तरह से जानते हैं, वो ये अटकलें लगा रहे हैं। लेकिन इस बारे में पक्के तरीके से कहना तब तक मुश्किल होगा, जब तक कि वो इस बात की औपचारिक रूप से घोषणा न कर दें या जब तक उनकी खोज की दूसरे वैज्ञानिकों की ओर से पुष्टि नहीं की जा सके। कहा जाता है कि तेल और गैस दोनों राजनीति की तरह होते हैं। जब तक वह हो न जाये पूरे तरीके से, तब तक उसके बारे में शर्तिया तरीके से कुछ कहना मुश्किल होता है। राजीव रंजन झा: केजी बेसिन में अभी तक जितनी खोज हो चुकी है, उससे तुलना करें तो यह नयी खोज, जिसका आपने संकेत दिया, वह उससे कितनी बड़ी हो सकती है? नरेंद्र तनेजा: देखिए केजी बेसिन तो काफी बड़ा है। लेकिन खाली रिलायंस के डी-6 ब्लॉक को देखें तो जहाँ उत्पादन हो चुका है वहाँ सिर्फ 25 फीसदी ही खोज हुई है। वहाँ पर 75 फीसदी खोज (एक्सप्लोरेशन) होनी बाकी है। इसके अलावा उसके आसपास के ब्लॉक है अगर उनको देखें तो वहाँ जितनी खोज होनी चाहिए थी, उसकी 5 फीसदी भी नहीं हो पायी है। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि वह पूरा इलाका आने वाले समय के अंदर मैक्सिको की खाड़ी जैसा बन जायेगा। भारत की गैस की आवश्यकता का बड़ा हिस्सा वहाँ से पूरा होगा। ये अभी सिर्फ कहानी की शुरुआत है। रिलायंस भारत की एकमात्र ऐसी कंपनी है जिसको यह अनुभव है कि गहरे पानी में किस तरह से जाना चाहिए, कैसे गैस की खोज करनी चाहिए, और जब खोज हो जाये तो कैसे गैस का उत्पादन करना चाहिए। उनको यह अनुभव हासिल हो चुका है। इस हिसाब से उनको ओएनजीसी के ऊपर कुछ बढ़त मिली रहेगी, जहाँ तक कि गहरे समुद्र में उत्पादन (डीप वाटर प्रोडक्शन) की बात है। राजीव रंजन झा: मैं यह समझना चाह रहा था कि आपने जिस नयी खोज का संकेत दिया, वह अभी तक रिलायंस के पास उपलब्ध गैस की तुलना में कितनी बड़ी है? नरेंद्र तनेजा: लगभग उसके बराबर है। क्योंकि अभी तक 20 ट्रिलियन क्यूबिक फीट की ही बात है। अब जो अटकलें लगायी जा रही हैं, वो भंडार भी लगभग उसी आकार के हैं, जिस आकार के भंडार आज डी-6 में रिलायंस के पास हैं। राजीव रंजन झा: तो क्या यह माना जाये कि अभी तक रिलायंस को जितना बड़ा गैस भंडार मिला है, लगभग उतना बड़ा ही भंडार फिर से मिल सकता है। नरेंद्र तनेजा: लगभग इतना बड़ा ही भंडार मिल सकता है। ऐसी अटकलें हैं। (शेयर मंथन, 01 नवंबर 2010)