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Written by शेयर मंथन
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Monday, 01 February 2010 22:37 |
महेश उप्पल, निदेशक, कॉम फर्स्ट इंडिया
अगर 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में देरी होती है तो यह देरी जमे-जमाये जीएसएम मोबाइल ऑपरेटरों को आंशिक रूप से नुकसान कर सकती है।
दरअसल व्यस्त इलाकों में उनके नेटवर्क जाम हो चले हैं। भारत की ब्रॉडबैंड संबंधी आकांक्षाओं से भी समझौता करना पड़ेगा। इससे केवल मोबाइल सेवाओं की गुणवत्ता पर नहीं पड़ेगा, बल्कि ब्रॉडबैंड पर भी असर पड़ेगा। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि भारत में फिक्स्ड लाइन टेलीफोन का पर्याप्त नेटवर्क नहीं है, लिहाजा हमें वायरलेस मोबाइल को ही मुख्य विकल्प बनाना होगा। मुझे नहीं लगता कि पहले से मौजूद जीएसएम ऑपरेटर 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में देरी को पसंद करेंगे। नये ऑपरेटर या सीडीएमए के पुराने ऑपरेटरों को शायद इस देरी से कोई असर नहीं पड़े। मोबाइल सेवा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा जितनी बढ़ गयी है, उसे देख कर लगता है कि शायद 6 से ज्यादा ऑपरेटर नहीं टिक सकें। इस समय जितनी प्रतिस्पर्धा हो गयी है, वह स्वस्थ नहीं है। मौजूदा कॉल दरें लंबी अवधि में नहीं चल सकतीं। लेकिन ये सभी खिलाड़ी काफी बड़े हैं और शायद वे इतनी जल्दी हार नहीं मानेंगे। (शेयर मंथन, 01 फरवरी 2010) |
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Last Updated ( Tuesday, 02 February 2010 09:47 )
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