वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेज बढ़त का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड का भाव अचानक लगभग 120 डॉलर के आसपास पहुंचने से निवेशकों में घबराहट बढ़ गई है, जिसके चलते सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स करीब 2.5% तक गिरकर लगभग 77,000 के स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी में भी करीब 580 अंकों की कमजोरी दर्ज की गई। हालांकि अन्य एशियाई बाजारों की तुलना में भारतीय बाजार में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, क्योंकि कुछ एशियाई सूचकांकों में 5 से 6% तक की गिरावट देखी गई।
आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के रिटेल रिसर्च हेड पंकज पांडे के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर के ऊपर लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो इसका मतलब होगा कि वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई में व्यवधान कुछ समय तक जारी रह सकता है। ऐसे हालात पहले रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी देखने को मिले थे, जब बाजार में करीब 10-11% तक की गिरावट आई थी और लगभग 22-23 हफ्तों तक बाजार दबाव में रहा था। फिलहाल युद्ध से पहले के स्तर से निफ्टी में लगभग 8 प्रतिशत तक का करेक्शन पहले ही आ चुका है।
हालांकि पांडे का मानना है कि भारतीय बाजार में गिरावट बहुत ज्यादा गहरी नहीं होगी, क्योंकि कॉरपोरेट आय के आंकड़े अपेक्षा से बेहतर रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कोयले से पूरा होता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों का प्रभाव अन्य कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम हो सकता है। उनका अनुमान है कि बाजार में यहां से 3 से 4% तक और गिरावट संभव है, लेकिन इसके बाद यह कमजोरी निवेशकों के लिए खरीदारी का अवसर बन सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा समय में बाजार में घबराकर बाहर निकलने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है। क्योंकि यदि अचानक युद्ध में तनाव कम होने की खबर आती है, तो बाजार में तेज रिकवरी भी देखने को मिल सकती है। ऐसे संकेतों के लिए कच्चे तेल की कीमतें सबसे बड़ा संकेतक साबित होंगी। यदि तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तो यह संकेत होगा कि वैश्विक आर्थिक जोखिम कम हो रहे हैं और बाजार में स्थिरता लौट सकती है।
सेक्टर के लिहाज से देखें तो विदेशी निवेशकों की गतिविधियों से संकेत मिलता है कि कैपिटल गुड्स, पावर, मेटल और बीएफएसआई जैसे घरेलू मांग से जुड़े सेक्टरों में बेहतर अवसर मिल सकते हैं। वहीं आईटी सेक्टर में फिलहाल अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि वैश्विक मांग में सुस्ती और रिकवरी की टाइमलाइन को लेकर स्पष्टता नहीं है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़े सेक्टरों पर ज्यादा भरोसा करना चाहिए।
कॉरपोरेट नतीजों की बात करें तो तीसरी तिमाही में निफ्टी कंपनियों की कमाई उम्मीद से बेहतर रही है। सात तिमाहियों के बाद करीब 9 प्रतिशत की मुनाफा वृद्धि दर्ज की गई, जो पहले के अनुमान से ज्यादा है। आगे आने वाले वर्षों में कमाई की वृद्धि दर 14-15 % तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। खासतौर पर बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का क्षेत्र इसमें अहम भूमिका निभा सकता है, क्योंकि निफ्टी की कमाई में इसका बड़ा योगदान है।
हालांकि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इससे महंगाई बढ़ने और विभिन्न उद्योगों की लागत में इजाफा होने का जोखिम भी रहेगा। इसके बावजूद कुछ सेक्टरों जैसे बैंकिंग और ऑयल-गैस को इससे फायदा भी हो सकता है। इस तरह मौजूदा अनिश्चितता के माहौल में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह गिरावट अवसर साबित हो सकती है।
(शेयर मंथन, 10 मार्च 2026)
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