ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का असर वैश्विक बाजारों के साथ-साथ कच्चे तेल और भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दे रहा है।
बाजार विशेषज्ञ सुनील सुब्रमण्यम का कहना है कि ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संघर्ष लंबे समय तक चलेगा या आने वाले कुछ हफ्तों में कोई रास्ता निकल सकता है। विशेषज्ञ का मानना है कि इसे रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह एक-दो साल तक चलने वाले लंबे युद्ध के रूप में देखना फिलहाल उचित नहीं होगा।
इसके पीछे एक बड़ी वजह ईरान की युद्ध को लंबे समय तक जारी रखने की क्षमता बताई जा रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन को यूरोप और शुरुआती दौर में अमेरिका का मजबूत समर्थन मिला था, जिससे वह लंबे समय तक रूस के खिलाफ टिक पाया। इसके विपरीत ईरान के पास उस स्तर का अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं है। लेबनान और यमन जैसे देशों का समर्थन होने के बावजूद इसे यूरोप के सामूहिक समर्थन के बराबर नहीं माना जा सकता। इसलिए लंबे समय तक युद्ध खिंचने की संभावना सीमित मानी जा रही है।
विशेषज्ञ के आकलन में अगले 60 दिन इस संघर्ष के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। उनका अनुमान है कि अमेरिका इस अवधि में युद्ध को किसी निष्कर्ष तक पहुंचाने की कोशिश कर सकता है। इसके बाद अमेरिका में मिडटर्म चुनाव करीब आ जाएंगे, इसलिए अमेरिकी प्रशासन के लिए युद्ध को लंबा खींचना राजनीतिक रूप से भी मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से यह संभावना जताई जा रही है कि आने वाले समय में सीजफायर या किसी तरह का समझौता देखने को मिल सकता है।
हालांकि, यह आकलन निश्चित भविष्यवाणी नहीं बल्कि एक संभावित परिदृश्य है। अगर अमेरिका अगले कुछ महीनों में ईरान पर सैन्य दबाव बढ़ाता है और फिर युद्ध समाप्त करने का दावा करता है, तो इसका इस्तेमाल घरेलू राजनीति में भी किया जा सकता है। इसी बीच अमेरिका का ध्यान दोबारा टैरिफ जैसे आर्थिक मुद्दों की ओर जाता दिखाई दे रहा है। इससे संकेत मिल सकता है कि प्रशासन युद्ध के बजाय आर्थिक और चुनावी एजेंडे पर ज्यादा ध्यान देने की तैयारी कर रहा है।
बाजार के नजरिए से इसका मतलब यह है कि मौजूदा जियोपॉलिटिकल तनाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन सिर्फ डर के आधार पर बाजार से पूरी तरह बाहर निकलने की जरूरत भी नहीं है। अगर आने वाले 60 दिनों में तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं, तो बाजार को राहत मिल सकती है। वहीं तेल में दोबारा तेज उछाल और रुपये में भारी कमजोरी बाजार के लिए जोखिम बढ़ा सकती है। इसलिए फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे तेल, रुपये और जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम पर लगातार नजर रखें।
(शेयर मंथन, 11 अगस्त 2026)
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