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आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ में गिरावट के बाद भी वैल्यूएशन का दबाव, क्या अभी खरीदारी से बचना चाहिए?

आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ के शेयर में हालिया गिरावट के बावजूद वैल्यूएशन को लेकर अभी भी सवाल बने हुए हैं।

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का कहना है कि शेयर करीब 800 रुपये के स्तर से गिरकर लगभग 450 रुपये तक आ चुका है। इसके बावजूद मौजूदा वैल्यूएशन को पूरी तरह कंफर्टेबल नहीं माना गया। विशेषज्ञ के मुताबिक, इंश्योरेंस सेक्टर के शेयरों में मौजूदा परिस्थितियों में सही समय पर खरीदारी करने की कोशिश करना आसान नहीं है और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ अपेक्षाकृत ज्यादा वोलेटाइल शेयर है। इसलिए इसे एक साथ खरीदने के बजाय पोर्टफोलियो स्टॉक के तौर पर धीरे-धीरे जोड़ने की रणनीति पर जोर दिया गया।

आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ की ग्रोथ और वैल्यूएशन की बात करें तो चर्चा में बताया गया कि कंपनी की करीब तीन साल की सेल्स ग्रोथ लगभग 8 फीसदी रही है। वहीं, शेयर का P/E रेशियो करीब 40 से ऊपर बताया गया। यानी 800 रुपये से घटकर लगभग 450 रुपये तक आने के बाद भी वैल्यूएशन पूरी तरह सस्ता नजर नहीं आता। विशेषज्ञ ने कहा कि इंश्योरेंस सेक्टर में वैल्यूएशन कंफर्ट हासिल करना आसान नहीं होता, क्योंकि कंपनियों की भविष्य की ग्रोथ और बिजनेस मॉडल को ध्यान में रखते हुए बाजार अक्सर प्रीमियम वैल्यूएशन देता है।

चर्चा में इंश्योरेंस कंपनियों के पारंपरिक सेल्स मॉडल पर भी बात हुई। इंश्योरेंस कंपनियों के लिए एजेंट और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पॉलिसी बेचने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। नियामकीय बदलावों के कारण एजेंटों को मिलने वाले कमीशन में बदलाव होने की बात चर्चा में सामने आई। हालांकि, विशेषज्ञ का तर्क था कि इससे जरूरी नहीं कि पॉलिसी की बिक्री में बड़ी गिरावट आए। उनका मानना है कि एजेंटों के लिए कमीशन में बदलाव केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सेक्टर पर लागू होने की स्थिति में सभी कंपनियों के डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को उसी के अनुसार काम करना होगा।

कमीशन में कमी से बचने वाली राशि का इस्तेमाल कंपनियां अपने बिजनेस विस्तार और बैलेंस शीट को मजबूत करने में कर सकती हैं। चर्चा में यह सवाल भी उठाया गया कि अगर ग्राहक से लिया जाने वाला कुल प्रीमियम समान रहता है और एजेंट को मिलने वाला कमीशन घटता है, तो बची हुई राशि का फायदा ग्राहक को मिलेगा या कंपनी को। इस पर तर्क दिया गया कि कंपनियां इस अतिरिक्त राशि का इस्तेमाल अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए कर सकती हैं। यानी कमीशन की लागत कम होने का पूरा फायदा सीधे तौर पर प्रीमियम में कमी के रूप में ग्राहक तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं है।

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि नियामकीय बदलावों को इंश्योरेंस सेक्टर के लिए एक तरह के समायोजन के रूप में देखा जा सकता है। अगर एजेंट का कमीशन कम होता है, तो भी डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के पास अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियों के उत्पाद बेचने का विकल्प रहता है। लेकिन जब पूरे सेक्टर में कमीशन स्ट्रक्चर प्रभावित होता है, तो किसी एक कंपनी को छोड़कर दूसरी कंपनी में जाने से पहले जैसी स्थिति नहीं बनती। इसलिए इस बदलाव का असर पूरे इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल पर पड़ सकता है।

इंश्योरेंस सेक्टर में अभी भी लंबे समय की ग्रोथ की संभावना मौजूद है, क्योंकि देश में इंश्योरेंस के प्रति जागरूकता और कवरेज बढ़ाने की जरूरत है। ऐसे में नियामकीय बदलावों से बिजनेस मॉडल में कुछ बदलाव जरूर हो सकते हैं, लेकिन इससे सेक्टर की पूरी मांग खत्म होने की बात नहीं कही गई। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ के मामले में निवेशकों के लिए कंपनी की ग्रोथ, मौजूदा P/E, नियामकीय बदलाव और एजेंट नेटवर्क पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण रहेगा। चर्चा में दिए गए विचार व्यक्तिगत निवेश सलाह नहीं हैं, बल्कि शेयर और सेक्टर की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए एक विश्लेषणात्मक नजरिया हैं।


(शेयर मंथन, 30 सितंबर 2026)

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