आईडीएफसी फर्स्ट बैंक जालसाजी के अधिकांश पैसे हरियाणा सरकार को मिले वापस, शेयर में गिरावट थमी

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में हरियाणा सरकार के खातों में जालसाजी से निकाले गये अरबों रुपये की राशि का अधिकांश हिस्सा सरकारी खातों में वापस जमा हो गया है। वहीं, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक का शेयर भी सोमवार की भारी गिरावट के बाद मंगलवार को थोड़ा सँभला।

इस निजी बैंक की चंडीगढ़ शाखा में लगभग 590 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आया था, जिसके बारे में बैंक ने स्टॉक एक्सचेंजों को 21 और 22 फरवरी की मध्य रात्रि में जानकारी दी। यह रकम हरियाणा सरकार से जुड़े विभिन्न विभागों और संस्थाओं के खातों से निकाली गयी थी। यह बात सामने आते ही सोमवार, 23 फरवरी को बैंक के शेयर में करीब 20% की गिरावट दर्ज की गयी, जिससे इसके बाजार पूँजीकरण (Market Cap) में लगभग 14,000 करोड़ रुपये की कमी आ गयी।

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक का शेयर शुक्रवार, 20 फरवरी को बीएसई में 83.56 रुपये पर बंद हुआ था। 590 करोड़ रुपये की यह बड़ी जालसाजी सामने आने के बाद सोमवार 23 फरवरी को यह एकदम फिसल कर 75.21 रुपये पर खुला और शुरुआती घंटे में ही 66.85 रुपये के निचले स्तर तक टूट गया, जहाँ यह 20% के निचले सर्किट पर चला गया। हालाँकि सर्किट खुलने के बाद यह और नहीं फिसला, पर 16.2% गिरावट के साथ 70.04 रुपये पर बंद हुआ।

हालाँकि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने आज मंगलवार को विधानसभा में बताया कि 24 घंटे के भीतर 556 करोड़ रुपये की राशि सरकारी खातों में वापस जमा करा दी गयी है। वहीं बाजार में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक का शेयर शुरुआती कारोबार में हल्का दबाव दिखाने के बाद दोपहर बाद थोड़ा सँभला और 1.33% की बढ़त के साथ 70.97 रुपये पर बंद हुआ।

धोखाधड़ी क्या थी और कैसे अंजाम दी गयी?

प्रारंभिक जाँच के अनुसार, यह पूरा मामला चंडीगढ़ शाखा में संचालित हरियाणा सरकार से जुड़े खातों के एक विशेष समूह तक सीमित था। आरोप है कि बैंक के कुछ कर्मचारियों ने बाहरी तत्वों के साथ मिल कर मैनुअल चेक-डेबिट लेन-देन के जरिये रकम निकाली। बताया जा रहा है कि फर्जी हस्ताक्षरों वाले चेक जारी कराये गये या स्वीकार किये गये, जिन्हें बाहरी पक्षों ने प्रस्तुत किया और बिना समुचित सत्यापन के स्वीकृत (क्लीयर) कर दिया गया। इसके बाद धनराशि को बैंक के बाहर संदिग्ध खातों में स्थानांतरित कर दिया गया।

जाँच में कम-से-कम 391 संदिग्ध लेन-देन और 170 से अधिक खातों की पहचान हुई है। यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा। आरोप है कि बड़े लेन-देन पर भेजे जाने वाले प्रणाली-जनित संदेश और ईमेल अलर्ट को या तो दबा दिया गया या उनमें छेड़छाड़ की गयी, ताकि संबंधित सरकारी विभागों तक सूचना न पहुँचे। आंतरिक ‘मेकर-चेकर’ नियंत्रण, चेक के लिए पॉजिटिव पे प्रणाली और 5–10 लाख रुपये से अधिक के लेन-देन पर अनिवार्य सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को कथित रूप से आंतरिक मिलीभगत से दरकिनार किया गया।

बैंक के अनुसार, यह मामला केवल इन सरकारी खातों तक सीमित रहा और अन्य ग्राहकों या बैंक के समग्र परिचालन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। बैंक के कुल 2.83 लाख करोड़ रुपये के जमा आधार में सरकारी जमा का हिस्सा लगभग 0.5% के बराबर हैं।

कैसे पकड़ में आया मामला?

मामला फरवरी के मध्य में उस समय सामने आया, जब हरियाणा सरकार के एक विभाग ने अपना खाता बंद कर शेष राशि किसी अन्य बैंक में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। विभाग द्वारा बतायी गयी शेष राशि और बैंक के अभिलेखों में अंतर पाया गया, जिससे लगभग 490 करोड़ रुपये की प्रारंभिक कमी उजागर हुई।

18 फरवरी से अन्य सरकारी संस्थाएँ भी इसी तरह की विसंगतियों के साथ बैंक के पास पहुँचीं। बैंक की आंतरिक समीक्षा में अतिरिक्त लगभग 100 करोड़ रुपये की अनियमितताएँ सामने आयीं। इस प्रकार कुल 590 करोड़ रुपये का मामला जाँच के दायरे में आया। उसी दिन हरियाणा के वित्त विभाग ने तत्काल प्रभाव से आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और साथ ही एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक को भी सरकारी कार्यों से अलग कर दिया और सभी विभागों को अपनी जमा राशि अन्य बैंकों में स्थानांतरित करने का निर्देश जारी किया।

बैंक ने क्या कदम उठाये?

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने 20 फरवरी को मामले को अपनी विशेष धोखाधड़ी समिति के समक्ष रखा, 21 फरवरी को लेखा परीक्षा समिति और निदेशक मंडल को सूचित किया तथा 22 फरवरी को एक्सचेंजों को जानकारी दी। साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सूचना दी गयी, पुलिस में शिकायत दर्ज करायी गयी और स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट के लिए केपीएमजी को नियुक्त किया गया, जिसकी रिपोर्ट 4-5 सप्ताह में आने की उम्मीद है।

बैंक ने चंडीगढ़ शाखा के 4 कर्मचारियों को जाँच पूरी होने तक निलंबित कर दिया है। ये मध्यम और निचले स्तर के कर्मचारी बताये जा रहे हैं। प्रबंधन ने कहा है कि इसमें शामिल पाये जाने वाले कर्मचारियों और बाहरी पक्षों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक, दीवानी और आपराधिक कार्रवाई की जायेगी। पुलिस शिकायत दर्ज कर जाँच एजेंसियों को पूरा सहयोग दिया जा रहा है।

बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (एमडी एवं सीईओ) वी. वैद्यनाथन ने इसे ‘परंपरागत प्रकार की, सीमित दायरे की कर्मचारी धोखाधड़ी’ बताया और कहा कि बैंक की पूँजीगत स्थिति मजबूत है। बैंक ने बताया है कि लाभार्थी खातों को अवरुद्ध (फ्रीज) कर राशि वापस पाने की प्रक्रिया शुरू की गयी है। भविष्य में बड़े शाखा-आधारित लेन-देन के लिए अनिवार्य प्रणाली-आधारित ग्राहक पुष्टि और कृत्रिम मेधा (AI) आधारित हस्ताक्षर सत्यापन जैसी व्यवस्थाएँ लागू करने की बात कही गयी है।

रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर की प्रतिक्रिया

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 23 फरवरी को एक प्रेस वार्ता में कहा कि केंद्रीय बैंक इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है, लेकिन इसमें कोई प्रणालीगत समस्या नहीं है। उन्होंने कहा कि देश की बैंकिंग प्रणाली मजबूत है और पूँजी पर्याप्तता अनुपात 17% पर है, जो नियामक द्वारा तय न्यूनतम सीमा 11.5% से काफी अधिक है।

हरियाणा सरकार की कार्रवाई और मुख्यमंत्री की टिप्पणी

हरियाणा सरकार ने 18 फरवरी को ही आईडीएफसी फर्स्ट बैंक को अपने अधिकृत बैंकों की सूची से हटा दिया। मामले को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, सतर्कता विभाग और राज्य अपराध शाखा को सौंपा गया है। साथ ही वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 24 फरवरी को विधानसभा में कहा, ‘‘जो भी राशि गयी थी, वह 24 घंटे के भीतर हमारे खातों में वापस जमा करा दी गयी है। ब्याज सहित लगभग 556 करोड़ रुपये वापस आ गये हैं। इनमें करीब 22 करोड़ रुपये ब्याज के शामिल हैं।’’

उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार शून्य सहनशीलता की नीति पर काम करेगी। चाहे सरकारी अधिकारी हों, बैंक अधिकारी हों या निजी संस्थाएँ, जो भी दोषी पाया जायेगा, उसे किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जायेगा। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि प्रारंभिक जाँच में चार से पाँच मध्यम और निचले स्तर के बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आयी है और मामला एक ही शाखा तक सीमित है।

(शेयर मंथन, 24 फरवरी 2026)