विदेशी सेब से देसी किसानों को नुकसान या फायदा? एक्सपर्ट से जानें सच्चाई क्या है

कृषि व्यापार के विशेषज्ञ विजय सरदाना भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में जिस अंतरिम व्यापार फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है। यह फ्रेमवर्क संकेत देता है कि भारत ने अपनी बुनियादी कृषि कमोडिटीज को बचाते हुए हाई-वैल्यू और प्रोसेस्ड उत्पादों के लिए सीमित रूप से बाजार खोलने का रास्ता चुना है।

 

ड्राई फ्रूट्स और फलों के आयात को लेकर भी यह आशंका जताई जा रही है कि इससे हिमाचल और कश्मीर के सेब किसानों को नुकसान होगा। लेकिन अनुभव बताता है कि आयात से घरेलू किसानों को नुकसान के बजाय कई बार फायदा होता है। विदेशी सेब आने के बाद भारतीय सेब की पैकिंग, ग्रेडिंग और गुणवत्ता में सुधार हुआ और कीमतें भी बेहतर मिलीं। इससे किसानों की आय बढ़ी। अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा अक्सर घरेलू उत्पादकों को अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए मजबूर करती है, जो लंबे समय में फायदेमंद साबित होती है। डेयरी सेक्टर को लेकर भी काफी भ्रम है। आशंका जताई जा रही है कि अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आने से भारतीय दूध उत्पादकों को नुकसान होगा।

वास्तविकता यह है कि तरल दूध, दही, पनीर या खोया जैसे उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर ट्रेड नहीं होते। मुख्य रूप से मिल्क पाउडर और बटर ऑयल जैसे उत्पाद ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आते हैं और इन पर पहले से ही भारी ड्यूटी लगी हुई है। फ्रेमवर्क के तहत भारत ने इन बुनियादी डेयरी उत्पादों पर ड्यूटी में कोई बड़ी रियायत देने का संकेत नहीं दिया है। इसलिए घरेलू डेयरी सेक्टर पर तत्काल कोई बड़ा खतरा नजर नहीं आता। एक अहम चिंता अमेरिका से आने वाले पशु आहार, खासकर डीडीजीएस (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन सॉल्युबल्स) को लेकर है। यह मक्का से इथेनॉल बनाने के बाद बचने वाला प्रोटीन युक्त पदार्थ होता है, जो पशु चारे में इस्तेमाल होता है। यहां असली चिंता यह है कि कहीं यह जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) मक्का से बना हुआ न हो। अगर ऐसा हुआ तो भविष्य में जीएम सोया मील जैसे उत्पादों के आयात का रास्ता खुल सकता है, जिससे भारतीय सोयाबीन किसानों पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए सरकार से यह अपेक्षा है कि वह स्पष्ट करे कि आयात होने वाला डीडीजीएस जीएम होगा या नॉन-जीएम।

यह फ्रेमवर्क संकेत देता है कि भारत ने अपनी बुनियादी कृषि कमोडिटीज को बचाते हुए हाई-वैल्यू और प्रोसेस्ड उत्पादों के लिए सीमित रूप से बाजार खोलने का रास्ता चुना है। इससे आम उपभोक्ता को बेहतर गुणवत्ता और विकल्प मिलेंगे, जबकि घरेलू उद्योगों और किसानों पर दबाव बढ़ेगा कि वे अपनी गुणवत्ता, पैकिंग और प्रोसेसिंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप सुधारें। शुरुआत में कुछ क्षेत्रों को दर्द महसूस हो सकता है, लेकिन लंबे समय में इससे भारतीय कृषि और खाद्य उद्योग ज्यादा प्रतिस्पर्धी और मजबूत बन सकते हैं। असली जरूरत इस बात की है कि सरकार पारदर्शिता के साथ बताए कि किन उत्पादों पर कितनी रियायत दी जाएगी और किसानों को नई प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए जाएंगे।


(शेयर मंथन, 10 फरवरी 2026)

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