शेयर मंथन में खोजें

बिहारी लाल इंजीनियरिंग का आईपीओ: 100 साल की विरासत के साथ इंजीनियरिंग और स्टील कारोबार में विस्तार की तैयारी

बिहारी लाल इंजीनियरिंग अपना आईपीओ लेकर शेयर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है।

कंपनी का आईपीओ 12 तारीख को खुलने और 12 से 14 तारीख तक सब्सक्रिप्शन के लिए उपलब्ध रहने की जानकारी दी गई है। पंजाब के मंडी गोविंदगढ़ में स्थित कंपनी इंजीनियरिंग और मेटल इंडस्ट्री से जुड़ी है। कंपनी मुख्य रूप से मेटल रोल्स, इंजीनियरिंग कास्टिंग्स और अलॉय स्टील प्रोडक्ट्स का निर्माण करती है। कंपनी के मुताबिक उसके उत्पाद माइनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस, रेलवे, पावर और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल होते हैं।

कंपनी के मैनेजमेंट के अनुसार बिहारी लाल इंजीनियरिंग की कारोबारी विरासत करीब 100 साल पुरानी है। इस कारोबार की शुरुआत परिवार के पूर्वज लाला बिहारी लाल गर्ग ने की थी। शुरुआती दौर में कारोबार स्मॉल हार्डवेयर और स्टील ट्रेडिंग से जुड़ा था। इसके बाद कंपनी ने स्टील, रॉ मटेरियल, फिनिश्ड गुड्स और सीमेंट की ट्रेडिंग के जरिए अपना कारोबार बढ़ाया। समय के साथ परिवार की अगली पीढ़ियां कारोबार से जुड़ती गईं और कंपनी ने ट्रेडिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में कदम रखा।

कंपनी ने करीब 2011 में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की शुरुआत की। मैनेजमेंट का कहना है कि कंपनी का फोकस सामान्य कमर्शियल स्टील के बजाय स्पेशलाइज्ड इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स बनाने पर रहा है। इसी रणनीति के तहत कंपनी ने मेटल रोल्स और इंजीनियरिंग कास्टिंग्स का उत्पादन शुरू किया और बाद में अपनी प्रोडक्ट रेंज का विस्तार किया। 2022 में मंडी गोविंदगढ़ में रोलिंग मिल शुरू की गई, जहां स्टील बार्स का उत्पादन किया जाता है। कंपनी के मुताबिक उसके उत्पाद ग्राहकों की जरूरत के अनुसार टेलर-मेड तरीके से तैयार किए जाते हैं।

बिहारी लाल इंजीनियरिंग के कारोबार को तीन प्रमुख कैटेगरी में बांटा गया है—मेटल रोल्स, इंजीनियरिंग कास्टिंग्स और अलॉय स्टील प्रोडक्ट्स। कंपनी का दावा है कि उसके ग्राहक देश की बड़ी स्टील कंपनियों, सरकारी उपक्रमों, माइनिंग कंपनियों, पावर इक्विपमेंट कंपनियों, ऑटोमोबाइल सेक्टर, फोर्जिंग कंपनियों और डिफेंस से जुड़े संस्थानों तक फैले हुए हैं। इंजीनियरिंग कास्टिंग्स के क्षेत्र में कंपनी माइनिंग और पावर इक्विपमेंट इंडस्ट्री पर खास ध्यान देती है। इसके अलावा कंपनी के कुछ उत्पादों का निर्यात भी किया जाता है और मैनेजमेंट के अनुसार इंजीनियरिंग कास्टिंग कारोबार में 30 से 40 प्रतिशत तक एक्सपोर्ट हिस्सेदारी है।

माइनिंग सेक्टर के लिए कंपनी क्रशर में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स और कास्टिंग्स तैयार करती है। कंपनी के अनुसार उसके कुछ ग्लोबल OEM ग्राहक भी हैं और वह यूरोपीय बाजारों में अपने उत्पादों का निर्यात करती है। पावर सेक्टर में कंपनी थर्मल पावर प्लांट और बॉयलर इक्विपमेंट में इस्तेमाल होने वाली कास्टिंग्स और अलॉय स्टील प्रोडक्ट्स बनाती है। वहीं ऑटोमोबाइल और डिफेंस सेक्टर में कंपनी के उत्पाद फोर्जिंग कंपनियों, मशीन शॉप्स और सरकारी उपक्रमों की सप्लाई चेन का हिस्सा हैं।

कंपनी अपनी सबसे बड़ी ताकत अपने इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग मॉडल को मानती है। मैनेजमेंट के अनुसार कंपनी के पास स्क्रैप मेल्टिंग से लेकर फिनिश्ड प्रोडक्ट तक कई प्रक्रियाएं एक ही सिस्टम के भीतर हैं। इसमें स्टील मेल्टिंग, अलग-अलग प्रोसेसिंग, मशीनिंग और फिनिशिंग शामिल हैं। कंपनी के पास लैब, हीट ट्रीटमेंट शॉप और अन्य जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी मौजूद हैं। इसके अलावा कंपनी के मुताबिक उसके साथ 200 से ज्यादा स्किल्ड ऑफिसर्स काम कर रहे हैं। मैनेजमेंट का कहना है कि जटिल और महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स में क्वालिटी और समय पर डिलीवरी सबसे अहम होती है, इसलिए लंबे समय से बने ग्राहक संबंध कंपनी के लिए महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हैं।

कंपनी का दावा है कि उसके तीनों प्रमुख प्रोडक्ट्स को एक साथ बनाने वाली कंपनियां बाजार में बहुत कम हैं। यही वजह है कि कंपनी अपने बिजनेस मॉडल को अलग और यूनिक मानती है। मेटल रोल्स, इंजीनियरिंग कास्टिंग्स और अलॉय स्टील प्रोडक्ट्स के ग्राहक और इस्तेमाल अलग-अलग होने के कारण कंपनी का मानना है कि इससे कारोबार में विविधता आती है और किसी एक सेक्टर पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है।

मार्केट साइज की बात करें तो मैनेजमेंट के मुताबिक मेटल रोल्स के क्षेत्र में कंपनी भारत की कुल मांग का करीब 11 से 12 प्रतिशत हिस्सा पूरा करती है। इंजीनियरिंग कास्टिंग्स में कंपनी का एक्सपोर्ट कारोबार भी महत्वपूर्ण है। हालांकि कास्टिंग्स का बाजार अलग-अलग इंडस्ट्री और एप्लीकेशन में बंटा हुआ है, इसलिए इसका एक सिंगल मार्केट साइज बताना मुश्किल है। कंपनी ने माइनिंग से जुड़े क्रशर कास्टिंग्स में अपनी मजबूत स्थिति का भी दावा किया है।

अब बात आईपीओ की करें तो कंपनी का आईपीओ करीब 300 करोड़ रुपये के आसपास बताया गया है। इसमें लगभग 93 करोड़ रुपये का फ्रेश इश्यू और करीब 208 करोड़ रुपये का ऑफर फॉर सेल यानी OFS शामिल है। कंपनी के अनुसार फ्रेश इश्यू से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल कारोबार के विस्तार, नई क्षमता, मशीनरी और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर में किया जाएगा। वहीं OFS का हिस्सा मुख्य रूप से प्रमोटर परिवार की हिस्सेदारी से जुड़ा है। मैनेजमेंट ने स्पष्ट किया कि कंपनी ने अपनी जरूरत के मुताबिक फ्रेश कैपिटल जुटाने पर ध्यान दिया है, जबकि OFS का एक कारण शेयर बाजार की फ्री-फ्लोट संबंधी आवश्यकता भी है।

बिहारी लाल इंजीनियरिंग की एक खास बात यह है कि कंपनी लंबे समय से कर्ज को कम रखने की रणनीति पर चलती रही है। मैनेजमेंट के मुताबिक परिवार की कारोबारी सोच रही है कि कारोबार को संभव हो तो अपने संसाधनों से आगे बढ़ाया जाए। कंपनी का मानना है कि आईपीओ के जरिए जुटाई गई पूंजी से बिना बड़े कर्ज के विस्तार की गति बढ़ाई जा सकती है। मैनेजमेंट के अनुसार फिलहाल कंपनी के सामने मांग की कमी नहीं बल्कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने की चुनौती है।

आईपीओ से मिलने वाली पूंजी के अलावा कंपनी अपने आंतरिक संसाधनों से भी विस्तार पर काम कर रही है। मैनेजमेंट ने बताया कि करीब 50 करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट सहित आंतरिक स्रोतों से जुटाई गई रकम का इस्तेमाल मौजूदा विस्तार परियोजनाओं में किया जा रहा है। कंपनी की नई यूनिट और सोलर प्रोजेक्ट पर काम शुरू होने की जानकारी भी दी गई है। कंपनी का लक्ष्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स पर भी फोकस करना है।

आने वाले समय में कंपनी मेल्टिंग कैपेसिटी बढ़ाने के साथ ही हीट ट्रीटमेंट, फिनिश मशीनिंग, प्रिसीजन कैपेबिलिटी और टेस्टिंग सुविधाओं में निवेश करने की योजना बना रही है। इसके अलावा कंपनी एक फोर्जिंग शॉप भी स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है। मैनेजमेंट के मुताबिक इससे ऐसे उत्पाद बनाए जा सकेंगे जो वर्तमान में भारत में बड़े पैमाने पर उपलब्ध नहीं हैं और जिनके लिए आयात पर निर्भरता है। कंपनी का लक्ष्य घरेलू स्तर पर उत्पादन करते हुए ग्लोबल डिमांड को पूरा करना है।

कंपनी भविष्य में इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन को भी अपने विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है। मैनेजमेंट के अनुसार कुछ ऐसे मेटल रोल्स और इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स हैं जिनकी भारत में मांग तो काफी है, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा अभी आयात किया जाता है। कंपनी ऐसे उत्पादों के घरेलू निर्माण के अवसर तलाश रही है। इससे कंपनी को नए बाजार में प्रवेश का मौका मिलने के साथ-साथ भारत में विदेशी मुद्रा की बचत में भी योगदान मिलने की उम्मीद है।

स्टील सेक्टर में भारत की बढ़ती उत्पादन क्षमता को भी कंपनी अपने लिए बड़ा अवसर मानती है। मैनेजमेंट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में भारत का स्टील उत्पादन तेजी से बढ़ा है और आने वाले वर्षों में भी इंफ्रास्ट्रक्चर, निर्माण, रेलवे, डिफेंस और पावर जैसे क्षेत्रों में स्टील की मांग बढ़ने की संभावना है। कंपनी का मानना है कि इन सेक्टर्स की ग्रोथ से उसके मेटल रोल्स, कास्टिंग्स और अलॉय स्टील प्रोडक्ट्स की मांग को फायदा मिल सकता है।

कंपनी के मुताबिक उसके तीनों बिजनेस वर्टिकल्स को अलग-अलग अवसरों के तौर पर देखा जा रहा है। माइनिंग, डिफेंस और रेलवे जैसे सेक्टरों में बढ़ती मांग, भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली नीतियां और चीन-प्लस-वन रणनीति कंपनी के लिए नए अवसर पैदा कर सकती हैं। कंपनी पंजाब की औद्योगिक नीतियों और निवेश प्रोत्साहन योजनाओं से भी लाभ लेने की उम्मीद कर रही है।

हालांकि किसी भी आईपीओ में निवेश से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, आय, मुनाफा, मार्जिन, कर्ज, वैल्यूएशन, आईपीओ प्राइस और इश्यू से जुड़े जोखिमों को समझना जरूरी है। बिहारी लाल इंजीनियरिंग का कारोबार भले ही लंबे समय की औद्योगिक विरासत और विविध प्रोडक्ट पोर्टफोलियो पर आधारित हो, लेकिन निवेशकों को यह भी देखना होगा कि कंपनी अपनी विस्तार योजनाओं को किस तरह लागू करती है और बढ़ती क्षमता को वास्तविक बिक्री और मुनाफे में कितना बदल पाती है। इसलिए आईपीओ में निवेश का फैसला केवल कंपनी के मैनेजमेंट के दावों के आधार पर नहीं, बल्कि कंपनी के RHP और वित्तीय आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद ही लेना उचित होगा। 


(शेयर मंथन, 10 अगस्त 2026)

(आप किसी भी शेयर, म्यूचुअल फंड, कमोडिटी आदि के बारे में जानकारों की सलाह पाना चाहते हैं, तो सवाल भेजने का तरीका बहुत आसान है! बस, हमारे व्हाट्सऐप्प नंबर +911147529834 पर अपने नाम और शहर के नाम के साथ अपना सवाल भेज दें।)

 

कंपनियों की सुर्खियाँ

निवेश मंथन पत्रिका

देश मंथन के आलेख