क्या FMCG सेक्टर की धीमी ग्रोथ को भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का संकेत माना जा सकता है?
इस सवाल पर बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का कहना है कि केवल FMCG की ग्रोथ को देखकर पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन करना सही नहीं है। उनके मुताबिक, FMCG मुख्य रूप से रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा सेक्टर है और इसकी मांग का बड़ा हिस्सा पहले ही स्थापित हो चुका है।
उन्होंने कहा कि टूथपेस्ट, साबुन और शैंपू जैसे प्रोडक्ट लोगों की बुनियादी जरूरतों में शामिल हैं। इनकी खपत में बढ़ोतरी तभी बहुत तेज हो सकती है जब नए ग्राहक जुड़ें या मौजूदा ग्राहक ज्यादा मात्रा में खरीदारी करें। लेकिन जब किसी प्रोडक्ट की पहुंच गांव-गांव और बड़ी आबादी तक हो जाती है, तब केवल बेसिक प्रोडक्ट की मांग में तेज ग्रोथ हासिल करना मुश्किल हो जाता है।
बाजार विश्लेषक ने इस तर्क को भी खारिज किया कि FMCG में कमजोर ग्रोथ को सीधे GDP की कमजोरी से जोड़ दिया जाए। उन्होंने कहा कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में अलग-अलग सेक्टर ग्रोथ के इंजन बन सकते हैं। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां AI से जुड़ी कंपनियों में तेज गतिविधियां दिखाई दे रही हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर सेक्टर को उसी गति से बढ़ना चाहिए।
उनके मुताबिक, असली कंजम्पशन ग्रोथ को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि लोगों की डिस्पोजेबल इनकम बढ़ रही है या नहीं और वे उस अतिरिक्त आय को कहां खर्च कर रहे हैं। FMCG के जरूरी प्रोडक्ट्स की मांग और डिस्पोजेबल इनकम से बढ़ने वाली कंज्यूमर डिमांड को अलग-अलग समझना चाहिए। उनके अनुसार, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और अन्य discretionary categories में आय बढ़ने का असर ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।
इसलिए FMCG की धीमी ग्रोथ को अकेले भारतीय अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। FMCG सेक्टर की अपनी परिपक्वता, बड़ा मार्केट कैप और पहले से मौजूद ऊंची penetration भी इसकी ग्रोथ को प्रभावित करते हैं।
(शेयर मंथन, 22 सितंबर 2026)
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