भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम को लेकर अक्सर यह आलोचना सुनने को मिलती रही है कि यहां ज्यादातर “कॉपी कैट” मॉडल ही बने, दुनिया में अमेजन चला तो भारत में फ्लिपकार्ट बन गया, फिर वह भी बिक गया। ऐसे सवाल भी उठते रहे कि भारत ने ऐसा कौन-सा प्लेटफॉर्म बनाया जिसे पूरी दुनिया इस्तेमाल करे?
लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह धारणा तेजी से बदल रही है। अब फोकस केवल कंज्यूमर इंटरनेट तक सीमित नहीं है, बल्कि डीप टेक, स्पेस टेक, बायोटेक, सेमीकंडक्टर, बैटरी टेक्नोलॉजी और एआई आधारित एप्लीकेशंस जैसे क्षेत्रों में भारतीय स्टार्टअप्स वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की तैयारी कर रहे हैं।
वेंचर कैपिटल जगत के वरिष्ठ नाम सौरभ श्रीवास्तव का मानना है कि पिछले 10-12 वर्षों में, खासकर स्टार्टअप इंडिया के बाद, देश में एक नई ऊर्जा आई है। पहले जहां साल में मुश्किल से 100-200 निवेश योग्य स्टार्टअप मिलते थे, वहीं आज देश में दो लाख से अधिक स्टार्टअप सक्रिय हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब स्टार्टअप शुरू करने वाले लोग वे नहीं हैं जिन्हें नौकरी नहीं मिलती, बल्कि वे प्रोफेशनल्स हैं जो ऊंची सैलरी छोड़कर नवाचार के रास्ते पर चल रहे हैं। यह क्वालिटी ऑफ फाउंडर्स, उनका आत्मविश्वास और वैश्विक सोच, तीनों में बड़ा परिवर्तन दर्शाता है।
भारत की वैश्विक छवि में बदलाव की शुरुआत आईटी सर्विस सेक्टर से हुई। आज भारतीय आईटी इंडस्ट्री करीब 300 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच चुकी है और दुनिया की शीर्ष कंपनियों को सेवाएं दे रही है। हालांकि सवाल यह भी उठता है कि भारत की अपनी माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल, गूगल या ओपनएआई जैसी कंपनियां क्यों नहीं बनीं। इसका जवाब यह है कि ऐसी कंपनियों के लिए विशाल जोखिम पूंजी, बड़ा घरेलू बाजार और परिपक्व इकोसिस्टम चाहिए होता है, जो अब जाकर भारत में विकसित हुआ है। अमेरिका और चीन को छोड़ दें तो दुनिया के अधिकांश देशों में भी इस पैमाने की टेक दिग्गज कंपनियां नहीं बन सकीं। अब भारत में 1500 से अधिक वीसी फंड सक्रिय हैं और सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये का आरडीआई फंड भी घोषित किया है, जिससे डीप टेक और रिसर्च आधारित स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन मिलेगा।
डीप टेक के क्षेत्र में भारत की प्रगति उल्लेखनीय है। एआई आधारित ड्रग डिस्कवरी, नए प्रकार के प्रोपल्शन इंजन, हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन और सेमीकंडक्टर इनोवेशन जैसे क्षेत्रों में काम हो रहा है। ये कॉपी कैट मॉडल नहीं, बल्कि “फर्स्ट इन द वर्ल्ड” बनने की महत्वाकांक्षा वाले प्रयास हैं। आने वाले पांच से दस वर्षों में भारत सिलिकॉन वैली जैसे इकोसिस्टम की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है। लक्ष्य केवल कुछ यूनिकॉर्न बनाना नहीं, बल्कि 2047 तक लाखों इनोवेटिव स्टार्टअप्स का मजबूत आधार खड़ा करना है।
बड़ी पारंपरिक कंपनियों की बात करें तो अतीत में उन्होंने रिसर्च और डेवलपमेंट पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। लाइसेंस-कोटा राज और बाद के वर्षों में सुरक्षित बाजार ने जोखिम लेने की प्रवृत्ति को सीमित रखा। लेकिन अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा, ट्रेड डील्स और टेक्नोलॉजी सोवरेनिटी की आवश्यकता के कारण उद्योग जगत पर दबाव बढ़ रहा है। धीरे-धीरे बड़ी कंपनियां स्टार्टअप्स में निवेश, अधिग्रहण और इनक्यूबेशन की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।
एआई के उभार से आईटी सर्विस उद्योग पर भी सवाल उठ रहे हैं। दुनिया भर में नई एआई कंपनियों के आने से शेयर बाजार में अस्थिरता दिखी है। फिर भी भारतीय आईटी कंपनियों को लचीला और अनुकूलनशील माना जाता है। वे एआई टूल्स को अपनी सेवाओं में शामिल कर, कर्मचारियों को री-स्किल कर और नए बिजनेस मॉडल अपनाकर आगे बढ़ सकती हैं। संभव है कि भविष्य में कर्मचारी संख्या की वृद्धि धीमी हो, लेकिन प्रोडक्टिविटी और वैल्यू एडिशन बढ़े।
(शेयर मंथन, 24 फरवरी 2026)
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