बाजार को कब मिलेगा नया ट्रिगर? टैरिफ अनिश्चितता के बीच निवेशकों की नजर

बाजार आखिर कब रफ्तार पकड़ेगा और उसे नया ट्रिगर किससे मिलेगा। इस समय निवेशकों के मन में यही सबसे बड़ा सवाल है। पहले उम्मीद थी कि अमेरिका के साथ टैरिफ को लेकर जो अनिश्चितता बनी हुई है, वह सुलझते ही बाजार नई चाल पकड़ लेगा।

ट्रेड स्क्रिप्ट ब्रोकिंग के निदेशक संदीप जैन कहते है कि ट्रेड डील का एक फ्रेमवर्क भी सामने आया, लेकिन उसके बाद अमेरिकी अदालत द्वारा टैरिफ को अवैध ठहराने और फिर दोबारा 15% टैरिफ की चर्चा ने भ्रम की स्थिति बना दी। हालांकि यदि बातचीत फिर उसी फ्रेमवर्क पर होती है और टैरिफ 15% से 18% के दायरे में रहता है, तो इसे बहुत बड़ा नकारात्मक कारक नहीं माना जाना चाहिए। जब देश के भीतर जीएसटी 18% है तो वैश्विक व्यापार में 15-18% टैरिफ भी अत्यधिक असहज स्थिति नहीं बनाता।

दरअसल, पिछले कुछ क्वार्टर्स में जो सुस्ती दिखी, वह अधिकतर ट्रांजिशन फेज का परिणाम रही। जीएसटी में बदलाव, नीतिगत समायोजन और फिर टैरिफ को लेकर अनिश्चितता, इन सबका असर तीसरी और चौथी तिमाही पर पड़ा। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हर बदलाव के बाद एक समायोजन काल आता है, जिसमें थोड़ी नरमी दिखती है और फिर स्थिरता लौटती है। अब जब अधिकांश कंपनियों के तिमाही नतीजे सामने आ चुके हैं, तो संकेत मिल रहे हैं कि आने वाली अप्रैल से जून की तिमाही बेहतर रह सकती है। यदि मानसून सामान्य रहता है और ग्रामीण मांग में सुधार आता है, तो कई सेक्टरों में ग्रोथ को अतिरिक्त बल मिल सकता है।

मैक्रो स्तर पर देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल एक मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। कंपनियों के फंडामेंटल्स खराब नहीं हुए हैं, कमाई में गिरावट व्यापक नहीं है और नीतिगत मोर्चे पर भी स्थिरता है। असली समस्या माहौल और निवेशकों के मूड की है। जब सेंटिमेंट नकारात्मक होता है तो अच्छी खबरों का असर भी सीमित रह जाता है। इसके अलावा, हाल के समय में सोना और चांदी जैसे एसेट क्लासेस में तेज आकर्षण रहा, जिससे इक्विटी से कुछ पैसा बाहर गया। जापान और कोरिया जैसे बाजारों के बेहतर प्रदर्शन ने भी विदेशी निवेशकों का ध्यान खींचा। लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं होती; जैसे ही मुद्रा स्थिर होती है और वैल्यूएशन आकर्षक लगते हैं, विदेशी निवेश फिर लौट सकता है।

कुल मिलाकर तस्वीर उतनी खराब नहीं है जितनी दिखती है। कंपनियों की कमाई, अर्थव्यवस्था की दिशा और दीर्घकालिक संभावनाएं अब भी सकारात्मक हैं। इसलिए शॉर्ट टर्म उतार-चढ़ाव से घबराने की बजाय धैर्य रखना जरूरी है। अच्छे फंडामेंटल वाले स्टॉक्स में बने रहना, तिमाही नतीजों पर नजर रखना और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना ही समझदारी होगी। आने वाले छह महीने से एक साल में बेहतर रिटर्न्स की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। बाजार का मूड कब बदलेगा, यह शायद अचानक ही पता चले, लेकिन जब बदलेगा तो रफ्तार भी तेज हो सकती है।


(शेयर मंथन, 02 मार्च 2026)

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