भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील को लेकर बातचीत अब पहले चरण में प्रवेश कर चुकी है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों के नेताओं के बीच इस समझौते पर राजनीतिक स्तर पर सहमति बनी है, हालांकि यह अभी कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यापार समझौता नहीं है। अगले दो से तीन दिनों में एक संयुक्त बयान जारी होने की उम्मीद है, जिसमें इस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट की रूपरेखा और दिशा तय की जाएगी। सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका के साथ घोषित किया गया 500 अरब डॉलर का ट्रेड कमिटमेंट पांच सालों में पूरा किया जाएगा। इसमें पहले से चल रही परियोजनाएं और आने वाले नए निवेश दोनों शामिल हैं। खास तौर पर पूंजी-प्रधान सेक्टर जैसे ऊर्जा (एनर्जी) और डेटा सेंटर्स में बड़े निवेश की संभावना है। अधिकारियों के मुताबिक केवल डेटा सेंटर्स में ही करीब 20 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी, जो इस लक्ष्य का अहम हिस्सा बनेगा।
टैरिफ यानी आयात-निर्यात शुल्क को लेकर उठ रही चिंताओं पर सरकार ने कहा है कि जीरो ड्यूटी का फायदा एकतरफा नहीं होगा। कई मामलों में भारत को भी शून्य शुल्क का लाभ मिलेगा। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के कारोबारियों और निवेशकों के लिए व्यापार करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
अधिकारियों ने यह भी साफ किया कि फिलहाल यह समझौता केवल नेताओं के स्तर पर एक राजनीतिक सहमति है। आगे चलकर इसी फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के आधार पर विस्तृत द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement – BTA) पर बातचीत होगी। यानी यह प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ेगी और आने वाले महीनों में इस पर ठोस कानूनी ढांचा तैयार किया जाएगा।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील का यह पहला चरण दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। ऊर्जा, डेटा सेंटर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से भारत में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी रफ्तार मिल सकती है। हालांकि निवेशकों और कारोबारियों को अंतिम समझौते के नियम और शर्तें सामने आने तक धैर्य रखना होगा।
(शेयर मंथन, 03 फरवरी 2026)