जमीनी हकीकत से दूर हैं रियल एस्टेट कंपनियाँ

राजीव रंजन झाराजीव रंजन झा : जमीन जायदाद क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी डीएलएफ का शेयर साल 2008 के आरंभ में सेंसेक्स की तरह ही अपने ऐतिहासिक शिखर पर चला गया था।

तब सेंसेक्स 21,207 तक चढ़ा था, लेकिन वहाँ से टूटा और अक्टूबर 2008 में 7,697 तक नीचे गया। डीएलएफ भी जनवरी 2008 में चढ़ा था 1225 रुपये तक, मगर बाजार के साथ यह भी टूटा और फरवरी 2009 तक गिर कर 124 रुपये पर आ गया। उसके बाद बाजार सँभला। सेंसेक्स मार्च 2015 में 30,025 के नये ऐतिहासिक शिखर तक गया और अभी 28,000 के कुछ नीचे है। लेकिन डीएलएफ? यह 2008 से नीचे ही फिसलता रहा। फरवरी 2016 में यह 72 रुपये तक नीचे गया, हालाँकि अभी थोड़ा सँभल कर 150 रुपये के ऊपर आया है।

और यह कहानी केवल डीएलएफ की नहीं, बल्कि जमीन जायदाद क्षेत्र की अधिकांश कंपनियों की है। इस क्षेत्र का दूसरा बड़ा नाम यूनिटेक आज किसी गिनती में नहीं आता। बीच के दौर में कई गैर-सूचीबद्ध कंपनियाँ मध्यम श्रेणी के आवासीय क्षेत्र में तेजी से पाँव पसारती दिखीं, मगर आज आम्रपाली जैसी इन कंपनियों की खस्ता हालत किसी से छिपी नहीं है, जिनके बारे में सुना जा रहा है कि कर्मचारियों का वेतन भी अटकने लगा है। 

दरअसल जमीन-जायदाद के क्षेत्र में मंदी की स्थिति देखते हुए लगभग एक दशक निकल चुके हैं। सितंबर 2011 में हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (एचडीएफसी) के चेयरमैन दीपक पारिख ने कहा था कि जमीन-जायदाद के कारोबार में मंदी अभी कुछ समय और चलेगी। दीपक पारिख की इस टिप्पणी पर आधारित एक लेख में मैंने तब कहा था कि रियल एस्टेट क्षेत्र ने मांग को पहचानने में गलती की और उसका खामियाजा अब उसे भुगतना पड़ रहा है। तमाम बड़े शहरों के शॉपिंग मॉलों में खाली पड़ी दुकानें इस गलती का गवाह हैं।

मगर अफसोस, कि बीते पाँच सालों में उस गलती का कोई सुधार होता नहीं दिखा है। हालाँकि पाँच साल पहले मंदी के दौर में भी घर कर्ज का बाजार जरूर तेज था। लेकिन खुद दीपक पारिख बता रहे थे कि ज्यादातर कर्ज छोटी रकम के हैं और दूसरी-तीसरी कतार के शहरों में दिये गये हैं, जहाँ जमीन-जायदाद की कीमतें महानगरों की तरह बेतहाशा नहीं बढ़ी हैं।
लेकिन रियल एस्टेट क्षेत्र को जमीनी हकीकत का अहसास तब भी कम ही था और आज भी वही हालत है। मैंने तब अपने लेख में जिक्र किया था कि कोई व्यक्ति 2004 में 10 लाख रुपये का घर कर्ज लेकर जो मकान खरीद सकता था, उस पर वह 7.5% ब्याज दर के हिसाब से 20 साल के कर्ज पर करीब सवा आठ हजार रुपये की मासिक किश्त चुकाता। लेकिन आज (यानी सितंबर 2011) में वही मकान खरीदने के लिए उसे 30 लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ेगा और 12.5% की ब्याज दर पर हर महीने करीब 34,000 रुपये की किश्त भरनी पड़ेगी।

मैं तब जानकारों से पूछता था कि जो व्यक्ति 2004 में सवा आठ हजार रुपये की किश्त दे सकता था, क्या उसके लिए अब 34,000 रुपये की किश्त देना संभव है? कुछ जानकार लोग मानते थे कि संभव है और शायद जमीन-जायदाद क्षेत्र की कंपनियाँ उनकी ही बातें सुनती थीं। आज वही मकान खरीदने के लिए हर महीने शायद 60,000-70,000 रुपये से भी ज्यादा की किश्त चुकानी होगी। कितने लोग होंगे ऐसी स्थिति में? पाँच साल पहले मैंने लिखा था कि जब तक रियल एस्टेट क्षेत्र ऐसे विशेषज्ञों की सलाह पर चलता रहेगा, तब तक उसका संकट भी कायम रहेगा। और, वह संकट आज भी कायम है। Rajeev Ranjan Jha

(शेयर मंथन, 25 जुलाई 2016)

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