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सरकारी घाटे को नजरअंदाज करना बेवकूफी: कवि

इस अंतरिम बजट में सरकारी खजाने का घाटा (फिस्कल डेफिसिट) बढ़ कर 6% होने के अनुमान ने कई बाजार विश्लेषकों की चिंता को बढ़ा दिया है। मल्टीपल एक्स कैपिटल के सीईओ कवि कुमार का कहना है कि यह चेतावनी की घंटी है, क्योंकि इसमें अगर राज्य सरकारों के घाटे को भी मिला दें, तो कुल मिला कर जीडीपी के 11-12% के बराबर घाटा होता है। उनके मुताबिक यह ज्यादा चिंता की बात इसलिए है कि केवल सितंबर के बाद से धीमापन आने का इतना तीखा असर दिख रहा है।

कवि कुमार सब्सिडी बढ़ाने जैसे फैसलों को भी गैर-उत्पादक खर्च करार देते हैं। साथ ही, उनका कहना है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों का जो असर भविष्य में राज्य सरकारों पर होगा, उसे भी ध्यान में रखना जरूरी है। पिछले वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद तमाम राज्य सरकारों की वित्तीय हालत चरमरा गयी थी। कवि कुमार इस तर्क से पूरी तरह असहमत हैं कि विकास को बढ़ावा देने के लिए राजकोषीय (फिस्कल) अनुशासन में ढील दी जा सकती है। उनके मुताबिक इस ढील का सीधा मतलब यह होगा कि सरकार और ज्यादा नोट छापेगी और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ज्यादा कर्ज लेगी। सरकारी उधारी बढ़ने से कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए नकदी की कमी हो जायेगी। साथ ही उनका सवाल है कि राजकोषीय अनुशासन तोड़ने के बाद भी इस अंतरिम बजट में विकास को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।

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