सितंबर में सोने की कीमतों में तेज करेक्शन देखने को मिला है।
आईसीआईसीआई बैंक रिसर्च के मुताबिक, सितंबर में अब तक सोने की कीमतों में करीब 8% की गिरावट आई है। इसके पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर बदली उम्मीदें, अमेरिका में महँगाई का ऊँचा स्तर और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी प्रमुख कारण रहे। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में CPI और PPI महंगाई ऊँची बनी हुई है, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गयी। इससे महँगाई को लेकर चिंता बढ़ी और बाजार में फेड की सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीद मजबूत हुई। इसका असर अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड पर पड़ा, जिससे सोने की कीमतों पर दबाव आया।
हालाँकि, सोने में गिरावट के बावजूद इसकी बुनियादी माँग में मजबूती बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, निवेश माँग और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी सोने की कीमतों को सहारा दे रही है। चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने अगस्त में 20 टन सोना खरीदा, जो अक्टूबर 2023 के बाद उसकी सबसे बड़ी मासिक खरीद रही। इसके अलावा, अगस्त में गोल्ड ETF में 17.8 अरब डॉलर का निवेश आया। इससे 2026 की तीसरी तिमाही में गोल्ड ETF की माँग 144.7 टन तक पहुँच गयी। केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी और निवेश माँग ने सोने की कीमतों के लिए एक तरह का आधार तैयार किया है, जिससे तेज गिरावट सीमित रहने में मदद मिली है।
आने वाले समय में अमेरिकी फेड की सख्त नीति सोने की कीमतों के लिए चुनौती बनी रह सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, फेड ने सितंबर में ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की और महंगाई से जुड़े जोखिमों को लेकर सतर्क रुख बनाए रखा। ऊंची अमेरिकी रियल यील्ड और मजबूत डॉलर सोने की कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट का मानना है कि केवल सख्त मौद्रिक नीति सोने की व्यापक मजबूती को पूरी तरह पलटने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती, क्योंकि ETF में निवेश और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी जैसी संरचनात्मक माँग बनी हुई है।
रिपोर्ट में सोने के लिए कुछ दीर्घकालिक कारकों को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। अमेरिका के बढ़ते राजकोषीय घाटे और ऊंचे सरकारी कर्ज को लेकर चिंताएं बनी रह सकती हैं, जिससे निवेशकों की वैकल्पिक संपत्तियों में रुचि बढ़ सकती है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक और वित्तीय अनिश्चितताओं के बीच सोने को पोर्टफोलियो डायवर्सिफायर और हेज के तौर पर देखा जाता है। केंद्रीय बैंक भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के लिए सोने की खरीद जारी रख सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यदि अमेरिकी रियल यील्ड और डॉलर की मजबूती से जुड़ा मौजूदा दबाव आगे कम होता है, तो ये संरचनात्मक कारक फिर से सोने की कीमतों को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
आईसीआईसीआई बैंक रिसर्च ने 2026 के बाकी हिस्से के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत को 4,200 से 4,600 डॉलर प्रति औंस की रेंज में रहने का अनुमान बरकरार रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2027 की पहली छमाही में सोने में हल्की तेजी का रुझान रह सकता है और कीमत 4,600 से 5,000 डॉलर प्रति औंस की रेंज में रह सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर वैश्विक ऊर्जा कीमतों का दबाव कम होता है, तो सोने में तेजी की संभावना बढ़ सकती है।
भारत में भी सोने की कीमतों पर वैश्विक बाजार का असर देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक महीने में घरेलू सोने की कीमतों में करीब 8 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि इस दौरान रुपये में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ। कीमतों में गिरावट से उपभोक्ताओं को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन सोना अभी भी महँगा बना हुआ है, जिसका असर आभूषणों की माँग पर पड़ रहा है। शादी से जुड़ी माँग अपेक्षाकृत मजबूत रही, जबकि त्योहारी माँग में उपभोक्ताओं ने कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के बाद खरीदारी को लेकर कुछ सावधानी दिखाई। अगस्त में भारत का सोना आयात भी घटकर 2.3 अरब डॉलर रह गया, जो जुलाई में 4.2 अरब डॉलर था।
दूसरी ओर, भारत में गोल्ड ईटीएफ की माँग मजबूत बनी हुई है। अगस्त में भारतीय गोल्ड ईटीएफ में 2,600 करोड़ रुपये यानी करीब 26 अरब रुपये का निवेश आया। रिपोर्ट के अनुसार, आगे घरेलू सोने की कीमतें मुख्य रूप से वैश्विक सोने के बाजार की चाल से प्रभावित होंगी, जबकि रुपये में उतार-चढ़ाव अतिरिक्त अस्थिरता पैदा कर सकता है। त्योहारी और शादी के सीजन के आगे बढ़ने के साथ फिजिकल गोल्ड की माँग को भी कुछ समर्थन मिलने की उम्मीद है।
(शेयर मंथन, 25 सितंबर 2026)
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