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बजट से पहले बाजार की बड़ी उम्मीदें, क्या एफआईआई वापसी की कोई राह निकलेगी?

बजट से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार की जमीनी चुनौतियों को बहुत साफ तरीके से दिखाई दे रही है। 

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का मानना है कि इस समय सबसे बड़ी समस्या विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली है। इसकी वजह यह नहीं है कि भारत की कहानी खराब हो गई है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उन्हें यहां ग्रोथ और करेंसी, दोनों मोर्चों पर रिटर्न संतोषजनक नहीं दिख रहा। ऐसे में उनकी पहली बड़ी “विश” यही है कि सरकार अगर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स में राहत दे या तो उसे शून्य करे या उसकी अवधि बढ़ाकर तीन साल करे तो इससे एफआईआई को दोबारा भारतीय बाजार की ओर आकर्षित किया जा सकता है। यह कदम भले ही सीधे घरेलू निवेशकों के लिए न हो, लेकिन एफआईआई के लौटने से बाजार में जो तेजी आएगी, उसका फायदा अंततः सभी को मिलेगा। 

दूसरी अहम जरूरत के तौर पर उन्होंने कंजम्पशन यानी उपभोग को और मजबूत करने की बात कही। सरकार ने सही दिशा पकड़ी है, लेकिन इसे और बूस्ट करने की जरूरत है ताकि मांग बनी रहे। इसके उलट, जो बातें बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, उनमें उन्होंने किसी भी तरह के नए टैक्स या टैक्स बढ़ाने को शामिल किया, क्योंकि इससे सीधे तौर पर खपत पर नकारात्मक असर पड़ेगा। साथ ही, बहुत ज्यादा सख्त फिस्कल डिसिप्लिन के नाम पर सरकारी खर्च को अचानक रोक देना भी सही नहीं होगा। 4.2-4.4% के आसपास का फिस्कल डेफिसिट वैश्विक स्तर पर पहले ही बेहतर स्थिति में है, इसलिए सरकार को पूरी तरह “हाथ बांधकर” बैठने की जरूरत नहीं है। 

आज की स्थिति यह है कि महंगाई दर काफी नीचे है, जो आम आदमी और अर्थशास्त्र दोनों के लिहाज से अच्छी बात मानी जाती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ कमजोर हो रही है। चूंकि कंपनियों की कमाई, सरकार का टैक्स कलेक्शन और बाजार की अर्निंग्स नॉमिनल जीडीपी से जुड़ी होती हैं, इसलिए कम महँगाई के कारण ये आंकड़े दबाव में आ रहे हैं। नतीजा यह कि रियल जीडीपी भले ही ठीक दिख रही हो, लेकिन बाजार और निवेशकों को वह उत्साह नहीं मिल पा रहा।

शोमेश कुमार के मुताबिक, बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए 3-4% की महंगाई दर आदर्श मानी जाती है, क्योंकि यह प्रोड्यूसर्स को उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन देती है। समस्या यह नहीं है कि भारत में महंगाई नहीं है, बल्कि यह है कि हम उसे एक ही चश्मे से देखते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में महंगाई आज भी काफी ऊंची है। महंगाई दर असल में कीमतों के बढ़ने की रफ्तार होती है, न कि कीमतों का स्तर। अगर यह रफ्तार संतुलित रहे तो उत्पादक को भी फायदा होता है और उपभोक्ता की क्रय शक्ति भी बनी रहती है।

बजट से उम्मीद यह है कि सरकार बहुत बड़े चमत्कारी कदम न भी उठाए, तो कम से कम ऐसे संकेत दे जो बाजार को भरोसा दें। एफआईआई के लिए सीधे बड़े इंसेंटिव देना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अगर अर्निंग्स में सुधार और भविष्य की ग्रोथ के “ग्रीन शूट्स” दिखने लगें, तो विदेशी निवेशक खुद-ब-खुद लौट सकते हैं। फिलहाल संतुलन ही सबसे बड़ा मंत्र है ना जरूरत से ज्यादा सख्ती, ना बेकाबू ढील ताकि अर्थव्यवस्था, बाजार और निवेशक तीनों की नैया एक साथ पार लग सके।


(शेयर मंथन, 29 जनवरी 2026)

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