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क्या निफ्टी में 22,000 पर निवेश सही या 19,000 का इंतजार बेहतर?

पिछले दो वर्षों में बाजार की चाल को लेकर निवेशकों के मन में एक बड़ा सवाल बना हुआ है कि क्या यह सिर्फ ठहराव (कंसोलिडेशन) है या फिर कमजोरी का संकेत।

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का कहना है कि अगर गहराई से देखें तो यह साफ नजर आता है कि बाजार की मौजूदा स्थिति का मुख्य कारण अर्निंग ग्रोथ का अपेक्षा के अनुरूप न बढ़ पाना है। दरअसल, भारतीय बाजार की खासियत यह है कि वह भविष्य की संभावनाओं को पहले ही कीमतों में शामिल कर लेता है। 2020 से 2022 के बीच आई तेज रैली में भी यही हुआ, जहां बाजार ने आने वाली ग्रोथ को पहले ही फैक्टर कर लिया था। जब अक्टूबर 2024 के आसपास निफ्टी ने अपने उच्च स्तर बनाए, तब बाजार में एक आम धारणा थी कि निवेशित न रहना सबसे बड़ा जोखिम है। लेकिन इसके बाद बाजार ने गति खो दी और लगभग दो वर्षों तक सीमित दायरे में ही घूमता रहा। इसे कुछ लोग “बेयर मार्केट” कह सकते हैं, तो कुछ इसे “साइडवेज़ मार्केट” मानते हैं। हालांकि, यदि इसे व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो यह एक सामान्य चक्र का हिस्सा है, जहां लंबी तेजी के बाद 1.5 से 2 साल का कंसोलिडेशन आना स्वाभाविक होता है।

मार्केट साइकल के हिसाब से 5 साल की अवधि में अक्सर 1 से 2 साल ऐसे आते हैं जब बाजार ज्यादा आगे नहीं बढ़ता। इसका कारण यह है कि पहले हुई तेजी में भविष्य की संभावनाएं पहले ही शामिल हो चुकी होती हैं, और फिर बाजार को नए ट्रिगर्स की जरूरत होती है। इस बार यदि वैश्विक तनाव या युद्ध जैसी अप्रत्याशित घटनाएं नहीं होतीं, तो यह कंसोलिडेशन अधिक व्यवस्थित और स्थिर हो सकता था। लेकिन अचानक आए इन घटनाक्रमों ने बाजार में अतिरिक्त दबाव जरूर बनाया है।

फिर भी, मौजूदा गिरावट को एक बड़े अपट्रेंड के भीतर एक स्वस्थ करेक्शन के रूप में देखा जा सकता है। अगर आने वाले समय में आर्थिक संकेतक, जैसे GDP ग्रोथ 6.5% के आसपास बनी रहती है, तो बाजार में बहुत बड़ा नुकसान होने की संभावना कम दिखाई देती है। इसका मतलब यह है कि ज्यादातर नकारात्मक प्रभाव पहले ही कीमतों में शामिल हो चुका है। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या 22,000 के आसपास निवेश करना सही है या 19,000 जैसे निचले स्तरों के डर से दूर रहना चाहिए। इतिहास बताता है कि जब भी बाजार अपने निचले स्तरों के पास होता है, तब उससे और नीचे जाने की आशंकाएं सबसे ज्यादा चर्चा में रहती हैं। लेकिन वास्तव में कोई भी निवेशक सटीक बॉटम या टॉप को लगातार पकड़ नहीं सकता।

इसलिए एक व्यावहारिक रणनीति यही हो सकती है कि यदि निवेशक में जोखिम सहने की क्षमता है, तो 22,000 से 23,000 के स्तर पर धीरे-धीरे निवेश बनाए रखें। हालांकि, इसके साथ यह मानसिक तैयारी भी जरूरी है कि अगर बाजार 19,000 तक भी चला जाए, तो घबराने के बजाय धैर्य बनाए रखें या फिर अवसर के रूप में देखें। दूसरी ओर, यदि कोई निवेशक इस तरह की गिरावट को सहन नहीं कर सकता, तो उसके लिए बेहतर होगा कि वह स्पष्ट तेजी के संकेत (जैसे 24,000 के ऊपर मजबूती) का इंतजार करे, भले ही उसे थोड़ा महंगा खरीदना पड़े।

यह समझना जरूरी है कि इक्विटी एक “रिस्क एसेट क्लास” है, जहां बिना जोखिम लिए बेहतर रिटर्न संभव नहीं है। बाजार में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं और इन्हें स्वीकार करते हुए ही निवेश करना चाहिए। जो निवेशक हर साल निश्चित रिटर्न या हर 3 से 4 साल में पैसा दोगुना होने की उम्मीद रखते हैं, उनके लिए यह बाजार उपयुक्त नहीं है। सफल निवेश के लिए धैर्य, अनुशासन और सही समय-सीमा का होना सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।

 



(शेयर मंथन, 10 अप्रैल 2026) (आप किसी भी शेयर, म्यूचुअल फंड, कमोडिटी आदि के बारे में जानकारों की सलाह पाना चाहते हैं, तो सवाल भेजने का तरीका बहुत आसान है! बस, हमारे व्हाट्सऐप्प नंबर +911147529834 पर अपने नाम और शहर के नाम के साथ अपना सवाल भेज दें।)

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