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तो आरबीआई (RBI) कब तक घटा सकेगा ब्याज दरें?

राजेश रपरिया
मई में अनुमान से ज्यादा खुदरा महँगाई दर यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) बढ़ने से निकट भ​विष्य में ब्याज दरों में कमी की आस को तेज झटका लगा है।

पिछले साल के मुकाबले खाद्य वस्तुओं और तेल कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि से खुदरा महँगाई दर मई के महीने में 5.76% दर्ज हुई है। खाद्य महँगाई 7.55% हो गयी है। पिछले साल के मुकाबले दालों में 31.6%, चीनी में 14%, सब्जियों में 10.8%, अंडों में 9.1% और माँस—मछली 8.7% की कीमत बढ़ोतरी हुई है। जून में यह महँगाई दर कम होने की उम्मीद नहीं है क्योंकि जून में तेल और दूध के दामों वृद्धि हुई है। ग्रामीण भारत में खुदरा महँगाई शहरों के मुकाबले ज्यादा है।
आने वाले महीनों में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होनी हैं। इससे नकदी प्रभाव बढ़ने के कारण कीमत स्तर बढ़ने के खतरे को नकारा नहीं जा सकता है। जून में ही सर्विस टैक्स भी बढ़ा है। पिछले मंगलवार को ही महँगाई की आशंका से भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में कोई बदलाव नहीं किया था। रिजर्व बैंक को उम्मीद है कि जनवरी 17 में खुदरा महँगाई दर 5% रहेगी और अगस्त में रेपो दर में कटौती अब दूर की कौड़ी नजर आती है।
हालाँकि अच्छे मानसून की संभावना से अब भी ब्याज दर कम होने की उम्मीद बनी हुई है। सितंबर 2016 के बाद से खाद्य कीमतों पर अकुंश लगने की उम्मीद प्रबल है। खुदरा महँगाई सूचकांक में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग आधी है। अप्रैल महीने में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में 0.8% की गिरावट आयी है। इस सूचकांक में 75.5 % वजन विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र का है, जो लगातार कमजोर बना हुआ है, विशेष कर पूँजीगत सामान उत्पादन का। नतीजतन इससे निजी निवेश निराशाजनक बना हुआ है। उद्योग जगत का कहना है कि ब्याज दरें कम होने से निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। यदि डॉलर और तेल की कीमतों ने मुँह नहीं उठाया तो दिसंबर 2016 में खाद्य महँगाई का गिरना तय सा है। तभी ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद की जा सकती है। (शेयर मंथन, 16 जून 2016)

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