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विशेषज्ञ से जानें क्यूएसआर (Quick Service Restaurant) सेक्टर क्यों नहीं चल रहा?

एक निवेशक जानना चाहते हैं कि उन्हें क्यूएसआर (Quick Service Restaurant) के शेयर में आगे क्या करना चाहिए? आइए, बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार से जानते हैं कि शेयरों में आगे क्या होने की संभावना है?

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि मन में यह सवाल आता है कि जब देश में खाने-पीने की मांग इतनी मजबूत है, फूड डिलीवरी के ऑर्डर लगातार बढ़ रहे हैं और केएफसी, डोमिनोज, बर्गर किंग जैसे ब्रांड हर जगह नजर आ रहे हैं, तो फिर क्यूएसआर सेक्टर के शेयरों में वैसी तेजी क्यों नहीं दिख रही। ऊपर से देखने पर लगता है कि पूरा बिज़नेस फल-फूल रहा है, लेकिन शेयर बाजार की कहानी जमीन पर दिख रही भीड़ से थोड़ी अलग होती है।

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि भारत में क्यूएसआर अभी भी एक नवेल और अर्ली-स्टेज बिजनेस मॉडल है। अमेरिका या यूरोप के मुकाबले यहां संगठित फास्ट-फूड कल्चर अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं हुआ है। इसी वजह से बड़ी कंपनियां जैसे देवयानी इंटरनेशनल, जुबिलेंट फूडवर्क्स, रेस्टोरेंट ब्रांड्स और अब सफायर जैसी कंपनियां आक्रामक तरीके से आउटलेट एक्सपेंशन पर फोकस कर रही हैं। वे हर साल सैकड़ों नए स्टोर खोल रही हैं, जिससे सेल्स तो बढ़ती दिखती है, लेकिन मुनाफ़ा उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पाता।

क्यूएसआर एक वॉल्यूम-ड्रिवन कंजम्पशन बिजनेस है। यहां सबसे अहम मैट्रिक प्रॉफिट नहीं बल्कि सेल्स और स्टोर-लेवल परफॉर्मेंस होती है। यही वजह है कि इन कंपनियों को अक्सर प्राइस-टू-सेल्स या एंटरप्राइज वैल्यू जैसे पैमानों पर देखा जाता है, न कि शुद्ध मुनाफ़े पर। जब कोई बिज़नेस 1.5x, 2x या 3x सेल्स पर ट्रेड कर रहा होता है और उसके सामने लंबी ग्रोथ की संभावना हो, तो वह वैल्यूएशन बहुत महंगी नहीं मानी जाती।

एक और बड़ा कारण यह है कि क्यूएसआर कंपनियाँ जो कैश कमा रही हैं, उसे बिजनेस में वापस री-इन्वेस्ट कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर देवयानी इंटरनेशनल को देखें, कंपनी ऑपरेशनल लेवल पर कैश जनरेट कर रही है, यानी बिज़नेस चल रहा है और पैसा बन रहा है। लेकिन वह कैश सीधे मुनाफे के तौर पर नीचे नहीं दिखता, क्योंकि उसे नए स्टोर्स, किचन, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी में लगाया जा रहा है। इस वजह से ऑपरेटिंग लिवरेज अभी पूरी तरह नजर नहीं आता।

ऑपरेटिंग लिवरेज का मतलब होता है कि जब एक बार फिक्स्ड कॉस्ट रिकवर हो जाए, तो उसके बाद बढ़ती सेल्स का सीधा फायदा मुनाफ़े में दिखने लगे। क्यूएसआर में अभी ऐसा नहीं हो रहा, क्योंकि एक तरफ नए स्टोर खुल रहे हैं और दूसरी तरफ उन्हीं स्टोर्स पर डेप्रिसिएशन और दूसरे खर्चे बॉटम लाइन को दबा रहे हैं। यह खर्चे कई बार नॉन-कैश होते हैं, लेकिन अकाउंटिंग में प्रॉफिट को कम दिखाते हैं।

क्यूएसआर बिज़नेस को समझने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ बैलेंस शीट देखना नहीं, बल्कि प्राइमरी रिसर्च करना है। खुद जाकर केएफसी, डोमिनोज, बर्गर किंग, पिज्जा हट या टाको बेल जैसे आउटलेट्स में बैठकर देखिए, फुटफॉल है, लोग लगातार खा रहे हैं, ऑर्डर आ रहे हैं। इसका मतलब बिज़नेस चल रहा है। कुछ ब्रांड्स जैसे पिज्जा हट अभी ट्रांजिशन फेज में हैं, लेकिन एक्विजिशन और री-स्ट्रक्चरिंग के बाद वहां भी सुधार की उम्मीद की जाती है।

असल बात यह है कि क्यूएसआर सेक्टर अभी कैपेसिटी एक्सपेंशन फेज में है। जब एक समय आएगा कि पूरे देश में नेटवर्क काफी हद तक फैल चुका होगा, तब नया कैपेक्स धीमा पड़ेगा। उसी समय पुराने स्टोर्स मैच्योर होंगे और वही स्टोर्स असली मुनाफ़ा देना शुरू करेंगे। हर स्टोर को प्रॉफिटेबल बनने में भी समय लगता है, और यह एक-दो तिमाही का खेल नहीं बल्कि कई सालों की प्रक्रिया है।

इसलिए आज क्यूएसआर शेयरों में जो सुस्ती दिख रही है, वह इस बात का संकेत नहीं है कि बिज़नेस खराब है। बल्कि यह बताता है कि सेक्टर अभी ग्रोथ के शुरुआती और निवेश-भारी दौर में है। भारत जैसे देश में फूड डिलीवरी और क्यूएसआर मॉडल पहले ही सफल साबित हो चुका है। सवाल सिर्फ समय का है।

लॉन्ग-टर्म निवेशक के नजरिए से देखें तो क्यूएसआर सेक्टर 5-10 साल की कहानी है। यहां तुरंत मल्टीबैगर ढूंढना मुश्किल है, लेकिन धैर्य रखने वालों के लिए यह सेक्टर आने वाले वर्षों में शेयरहोल्डर वेल्थ क्रिएशन की पूरी क्षमता रखता है। अभी पैसा न दिखने का कारण बिजनेस की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका विस्तार है।


(शेयर मंथन, 26 जनवरी 2026)

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