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छका रही हरियाली बार-बार, उलझा रही राजनीतिक बयार

राजीव रंजन झा : शेयर बाजार में हर दिन लाली हरियाली से खेलने वाले सभी निवेशकों-कारोबारियों को होली मुबारक! कल भी निफ्टी ने आपको पहले हरा रंग लगाया, फिर लाल कर दिया!
दरअसल यह लगातार तीसरा ऐसा दिन था, जब शेयर बाजार ने आपको इस तरह से छेड़ा। भारतीय बाजार वैसे तो लगातार 7 कारोबारी दिनों से फिसलता जा रहा है, लेकिन आपको यह ध्यान होगा कि निफ्टी ने गुरुवार और शुक्रवार को भी वापस उछाल की अच्छी कोशिश के बाद हार मान ली थी। कल सोमवार को एक बार फिर यही कहानी दोहरा गयी। 
दरअसल थोड़ा और पहले जायें तो 19 मार्च को भी ऐसी ही बात दिखी थी। उस दिन निफ्टी अपने ऊपरी स्तर पर 29 अंक की बढ़त दिखा रहा था, लेकिन अंत में यह 89 अंक टूट गया था। उस दिन का ऊपरी स्तर 5864 था, जहाँ से निचले स्तर 5724 तक की गिरावट 140 अंक की थी। 
फिर पिछले गुरुवार 21 मार्च को निफ्टी 64 अंक तक की शानदार बढ़त दिखाने के बाद अंत में 46 अंक के नुकसान पर रहा। दिन के ऊपरी स्तर 5758 से निचले स्तर 5648 तक की गिरावट 110 अंक की रही। 
इसके बाद शुक्रवार को निफ्टी ने दिन के ऊपरी स्तर 5691 पर 43 अंक की मजबूती दिखायी। लेकिन इसके बाद यह 5632 तक फिसलने के बाद 5651 पर बंद हुआ, 8 अंक नीचे। 
कल सोमवार को सुबह जब निफ्टी 5718 तक उछला तो यह 67 अंक की शानदार बढ़त दिखा रहा था। लेकिन दो बजे के बाद आयी गिरावट से यह 17 अंक के नुकसान पर रहा। 
मोटी कहानी यह है कि इस बाजार में दिखने वाली हर हरियाली छका रही है और अंत में आपको लाल कर जा रही है। 
कल की गिरावट में बहाना बना राजनीतिक अनिश्चितता का डर। नेताजी कहिन, बाजार टूटिन। लेकिन एक पहेली समझ में नहीं आयी। मुलायम सिंह यादव ने तीसरे मोर्चे की बात रविवार को कही थी। अखिलेश यादव का बयान भी बाजार के सामने पहले से था। ठीक 2 बजे बाजार में पटाखा क्यों फूटा? कभी-कभी कुछ सवालों के जवाब नहीं मिल पाते हैं। यह भी कुछ ऐसा ही सवाल है। 
रही बात तीसरे मोर्चे की, तो यह कोई पहला मौका नहीं है, जब मुलायम सिंह ने यह मंत्रजाप किया हो। जहाँ तक समय से पहले चुनाव की उनकी भविष्यवाणी है, आपको याद दिला दूँ कि पिछले साल फरवरी में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित ढंग से शानदार जीत के बाद से मुलायम सिंह लगातार यह भविष्यवाणी करते आ रहे हैं। अगर उनकी हर भविष्यवाणी सच होती चली गयी होती तो पिछली फरवरी से अब तक कम-से-कम दो-चार बार लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके होते। 
लेकिन बाजार भी मनमौजी है। वह बड़े सलीके से चुनता है कि एक ही व्यक्ति की बातों को कब नजरअंदाज करना है और कब उसे भाव देना है। कल उसने नेताजी की बातों को भाव दे दिया। इसका कारण यह है कि यूपीए का कुनबा चलाते रहने के लिए कांग्रेस के पास अब बाजीगरी दिखाने के लिए ज्यादा गेंदें बाकी नहीं बची हैं। पहले तो उसके सामने बड़े विकल्प थे। ममता गयीं तो भी करुणा-ममता-मुलायम का साथ था। चारपहिया गाड़ी आराम से चलती है। तिपहिया फिर भी ठीक चलती है। दोपहिया होने पर भी गाड़ी तो चलती रह सकती है, लेकिन अब डर है कि एक भी पहिया निकला तो सफर खत्म। 
बाजार की असली चिंता यह सफर खत्म होने से कहीं ज्यादा अगले सफर को लेकर है। कांग्रेस चाहे तो हँसी उड़ा सकती है कि तीसरा, चौथा, पाँचवा मोर्चा जैसी कोई चीज नहीं है। लेकिन बाजार को तीसरा मोर्चा नाम की यह चिड़िया डराती है। 
अभी हाल में एक बड़े राजनीतिक चिंतक ने मुझसे कहा कि जनता इस समय कांग्रेस से नाराज है और भाजपा से निराश है। शायद इसी बात को भाँप कर मुलायम सिंह भी तीसरा राग छेड़ रहे हैं। लेकिन पिछले साल भर में उनकी समाजवादी सरकार ने भी उत्तर प्रदेश में पुण्य नहीं कमाये हैं। दरअसल जनता इस कदर विकल्पहीन है कि कोई भी राजनीतिक पंडित अगले लोकसभा चुनाव के बाद उभरने वाले समीकरणों के बारे में पुख्ता दावे नहीं कर सकता। मुलायम सिंह जैसे दिग्गज राजनेताओं को भी नहीं पता कि उन्हें चुनाव के बाद किसका साथ लेना पड़ेगा या किसका साथ देना पड़ेगा। इसीलिए अटल-आडवाणी की तारीफें हो रही हैं, राजनाथ सिंह से कहा जा रहा है कि जरा नीतियाँ बदल लें तो हमारी दूरियाँ घट जायेंगी। और पलट कर राजनाथ सिंह का यह कहना भी बेमानी नहीं है कि हम दूर ही कब थे। 
आइडिया का वह विज्ञापन याद आ रहा है, जिसमें एक दक्षिण भारतीय व्यक्ति होली खेलने के बाद अपने बेटे के रंगे-पुते चेहरे को पहचान नहीं पाता। यहाँ चुनावों से पहले जो राजनीतिक होली शुरू हुई है, उसके रंग परवान चढ़ेंगे चुनावी नतीजे निकलने के बाद। तब आप पहचान नहीं पायेंगे कि कौन-सा नेता किस रंग का झंडा उठा कर आगे बढ़ गया! Rajeev Ranjan Jha
(शेयर मंथन, 26 मार्च 2013)

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