डॉलर के मुकाबले रुपये के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने से बाजार की चिंता बढ़ गई है।
बाजार विशेषज्ञ सुनील सुब्रमण्यम का कहना है कि रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा असर विदेशी निवेशकों पर पड़ता है क्योंकि मुद्रा अवमूल्यन से उनके निवेश का वास्तविक रिटर्न घट जाता है। वहीं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ कमजोर रुपया भारत के आयात बिल और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ा सकता है। हालांकि भारतीय कंपनियां अपने विदेशी मुद्रा जोखिम को हेजिंग के जरिए काफी हद तक नियंत्रित करती हैं, इसलिए कॉरपोरेट आय पर इसका असर सीमित रह सकता है। रुपये की कमजोरी से आईटी और फार्मा जैसे निर्यात आधारित सेक्टरों को कुछ फायदा मिल सकता है, लेकिन आईटी पर कमजोर वैश्विक मांग और एआई का दबाव, जबकि फार्मा पर टैरिफ संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में यदि रुपया आगे भी कमजोर होता है तो बाजार की धारणा पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है, भले ही कंपनियों की कमाई पर प्रभाव उतना बड़ा न दिखाई दे।
(शेयर मंथन, 05 अगस्त 2026)
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