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आईपीओ के बाद बीसीसीएल शेयरों में निवेश करें या नहीं, पीएसयू शेयरों को कैसे देखें?

निवेशक जानना चाहते हैं कि उन्हें बीसीसीएल (BCCL) के शेयर में आगे क्या करना चाहिए? आइए, बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार से जानते हैं कि शेयरों में आगे क्या होने की संभावना है?

बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि हाल ही में बीसीसीएल का आईपीओ बाजार में आया और इसे निवेशकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। लगभग 150 गुना सब्सक्रिप्शन किसी भी पीएसयू आईपीओ के लिए अपने-आप में बड़ी बात मानी जाती है। इसी संदर्भ में अभिषेक जी जैसे कई निवेशकों को यह अफसोस है कि वे आईपीओ में अप्लाई नहीं कर पाए। अब सवाल यह उठता है कि लिस्टिंग के बाद इसमें पैसा लगाना समझदारी होगी या नहीं। 

इस समय बीसीसीएल को लेकर बहुत स्पष्ट राय बनाना थोड़ा जल्दबाज़ी हो सकती है। आईपीओ के बाद शुरुआती कुछ समय में शेयर की असली चाल और निवेशकों की सोच धीरे-धीरे सामने आती है। इसलिए बेहतर यही है कि थोड़ा समय दिया जाए, कुछ और जानकारी और मार्केट का रुख साफ होने दिया जाए, उसके बाद ही कोई ठोस फैसला लिया जाए। अगर व्यापक नजरिए से देखें तो किसी भी पीएसयू शेयर में निवेश करने से पहले दो बातें दिमाग में बिल्कुल साफ होनी चाहिए। पहली बात यह कि पीएसयू में निवेश आमतौर पर पैसिव इन्वेस्टमेंट होता है। इसका मतलब है कि ये कंपनियां नियमित रूप से अच्छा डिविडेंड देती हैं, क्योंकि इनका बड़ा हिस्सा सरकार के पास होता है और डिविडेंड अंततः सरकार के खजाने में जाता है। यही वजह है कि कई पीएसयू शेयर 4-7% तक का डिविडेंड यील्ड देने में सक्षम होते हैं। 

दूसरी अहम बात यह है कि पीएसयू शेयरों को कभी भी “परमानेंट बाय एंड होल्ड” की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इनमें निवेश ज्यादा तर टैक्टिकल होता है। सही समय पर खरीदना और सही समय पर निकलना जरूरी होता है, क्योंकि इन कंपनियों का रेवेन्यू काफी हद तक सरकार के फैसलों और उन्हें मिलने वाले कॉन्ट्रैक्ट्स पर निर्भर करता है। ये प्राइवेट कंपनियों की तरह खुले बाजार में आक्रामक तरीके से कॉन्ट्रैक्ट नहीं ढूंढतीं।

कोल इंडिया और कुकिंग कोल जैसे उदाहरण इस सोच को और मजबूत करते हैं। एक समय ऐसा लगने लगा था कि रिन्यूएबल एनर्जी के दबाव में फॉसिल फ्यूल का दौर खत्म हो जाएगा। सरकारों और वैश्विक संस्थाओं की ओर से इतना जोर डाला गया कि ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोयला उद्योग का भविष्य ही नहीं बचेगा। लेकिन समय के साथ यह साफ हुआ कि जिन देशों ने सबसे ज्यादा ग्रीन एनर्जी की बात की, वही फॉसिल फ्यूल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी कर रहे हैं। चीन, यूरोप और बाकी दुनिया की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों ने यह साबित कर दिया कि कोयले की भूमिका अचानक खत्म नहीं होने वाली। 

हकीकत यह है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ेगी। रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार जरूर होगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि फॉसिल फ्यूल पूरी तरह गायब हो जाएगा। दोनों संसाधन अपनी-अपनी जगह इस्तेमाल होते रहेंगे। इसलिए कोल इंडिया जैसी कंपनियों की भी जगह बनी रहेगी और डिविडेंड के रूप में निवेशकों को रिटर्न मिलता रहेगा।


(शेयर मंथन, 19 जनवरी 2026)

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