मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद कि यह संघर्ष चार से छह हफ्ते तक चल सकता है।
निवेशकों के बीच चिंता का माहौल बन गया है। एशियाई बाजारों में भी इसका असर साफ दिखा। जापान का निक्केई इंडेक्स करीब 3.5% गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कॉस्पी इंडेक्स एक दिन में लगभग 12% तक टूट गया। भारतीय बाजार अपेक्षाकृत कम प्रभावित दिखे, लेकिन फिर भी दबाव साफ नजर आया। होली के दिन कारोबार के दौरान निफ्टी में लगभग 400 अंकों तक की गिरावट देखने को मिली, जिससे निवेशकों की घबराहट बढ़ गई और कई निवेशकों ने बाजार में भरोसा कमजोर होने की बात कही।
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के भू-राजनीतिक तनाव को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता। जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध या संघर्ष शुरू होता है, बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है और इसका असर कुछ समय तक दिखाई देता है। लेकिन इतिहास बताता है कि बाजार आमतौर पर दो से तीन ट्रेडिंग सेशन में शुरुआती गिरावट को काफी हद तक फैक्टर कर लेते हैं। इसके बाद बाजार अक्सर निचले स्तरों के आसपास स्थिर होने लगते हैं और कई मामलों में 15 दिनों से तीन महीने के भीतर फिर से तेजी भी देखने को मिलती है। इसलिए केवल युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव को बाजार से दूर रहने का कारण नहीं मानना चाहिए।
भारत के संदर्भ में सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा है, क्योंकि देश अपनी लगभग 85% ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। यदि ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में 10 डॉलर की स्थायी बढ़ोतरी होती है, तो यह भारत की जीडीपी पर लगभग 0.5% तक का नकारात्मक असर डाल सकती है। इसलिए निवेशकों को सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर देना चाहिए कि इस संघर्ष का तेल की कीमतों और सप्लाई पर कितना प्रभाव पड़ता है। हालांकि फिलहाल यह संघर्ष भारत की सीमा से दूर है, इसलिए इसका सीधा प्रभाव देश की सुरक्षा या जनजीवन पर नहीं पड़ रहा है। इसका असर मुख्य रूप से आर्थिक चैनलों के जरिए ही देखने को मिलेगा।
इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने पर सप्लाई चेन और ऊर्जा बाजारों में बाधा आई थी, जिसके कारण निफ्टी में लगभग 7% तक का करेक्शन देखने को मिला था। वहीं अप्रैल 2024 में जब ईरान ने इजराइल पर हमला किया था, तब तेल की कीमतों को लेकर आशंका बढ़ी और बाजार में करीब 3-4% की गिरावट आई थी। हालांकि इन दोनों ही मामलों में भारत सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं था और बाजार ने कुछ समय बाद स्थिरता भी हासिल कर ली थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में निवेशकों को घबराने के बजाय धैर्य रखने की जरूरत है। बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है और पोर्टफोलियो में 5% से लेकर 20% तक की गिरावट भी दिख सकती है, लेकिन ऐसे समय में निवेश को छेड़ना या जल्दबाजी में फैसले लेना नुकसानदायक हो सकता है। बेहतर रणनीति यह है कि निवेशकों को लंबी अवधि के निवेश पर टिके रहना चाहिए और लीवरेज या ज्यादा ट्रेडिंग से बचना चाहिए। अगर कॉर्पोरेट अर्निंग्स में सुधार जारी रहता है, जैसा कि FY26 की तीसरी तिमाही के नतीजों से संकेत मिल रहा है, तो आगे चलकर बाजार में नई तेजी देखने को मिल सकती है और FY27 में निफ्टी और बैंक निफ्टी के नए उच्च स्तर भी बन सकते हैं।
(शेयर मंथन, 06 मार्च 2026)
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