रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के नतीजों को लेकर बाजार में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी हुई है। हाल के तीन तिमाहियों से कंपनी के नतीजे लगातार बेहतर रहे हैं, ऐसे में यह उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी रिलायंस अपने रिजल्ट्स से बाजार को निराश नहीं करेगी।
निवेशकों का सवाल यह है कि क्या नतीजों के बाद रिलायंस का शेयर 1600 रुपये के स्तर तक पहुंच सकता है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लगता है कि कंपनी के प्रदर्शन को लेकर नकारात्मक धारणा बनाने की ठोस वजह नहीं है, क्योंकि कमजोर नतीजों की आशंका पहले ही शेयर की कीमत में काफी हद तक समाहित हो चुकी है। रिजल्ट्स के लिहाज से यह माना जा रहा है कि अगर नतीजे बहुत शानदार भी नहीं रहे, तब भी रिलायंस के शेयर में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट की संभावना कम है। यानी निचले स्तर पर 1400 रुपये के आसपास मजबूत सपोर्ट दिखाई देता है। कंपनी के अब तक के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए बाजार की अपेक्षा यही है कि नतीजे औसत से बेहतर ही रहेंगे, जिससे शेयर में बड़ी निराशा देखने को नहीं मिलेगी।
हालिया गिरावट में वैश्विक कारकों और खासतौर पर अमेरिका से जुड़े घटनाक्रमों का भी बड़ा योगदान रहा है। अमेरिकी नीतियों और बयानबाज़ी के चलते बाजार की धारणा पर असर पड़ा है, क्योंकि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भूमिका अहम होती है। हालांकि, अगर भारत के कुल एक्सपोर्ट डेटा पर नजर डालें, तो स्थिति उतनी खराब नहीं दिखती जितनी शोर में दिखाई दे रही है। कुछ क्षेत्रों में एक्सपोर्ट जरूर प्रभावित हुआ है, लेकिन समग्र रूप से भारतीय निर्यात बेहद निराशाजनक नहीं है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर भी काफी चर्चा बनी हुई है, लेकिन इसे जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर देखा जा रहा है। ऐसा लगता है कि भारतीय प्रशासन ने पहले ही यह आकलन कर लिया है कि अगर यह डील नहीं भी होती है, तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर नुकसान नहीं होगा। डॉलर इनफ्लो और ग्रोथ के लिहाज से कुछ असर जरूर पड़ सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिका के बिना भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ जाएगी। इसी वजह से भारत किसी एकतरफा शर्तों पर समझौता करने की जल्दबाज़ी में भी नहीं दिख रहा है।
निवेश के नजरिए से देखा जाए तो रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के लिए 1400 रुपये के आसपास का स्तर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए आकर्षक माना जा सकता है, हालांकि इसमें जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता। निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता और निवेश अवधि के हिसाब से फैसला लेना चाहिए। कुल मिलाकर, मौजूदा गिरावट को घबराहट की बजाय एक अवसर के रूप में देखा जा सकता है, बशर्ते निवेशक धैर्य और संतुलन बनाए रखें।
(शेयर मंथन, 15 जनवरी 2026)
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