बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि इस हफ्ते बाजार की चाल ने निवेशकों को थोड़ा उलझन में डाल दिया है। सप्ताह की शुरुआत बेहद शांत रही, फिर मंगलवार को तेजी दिखी, लेकिन उसके बाद बाजार फिर ठंडा पड़ गया।
बाजार विश्लेषक शोमेश कुमार का मानना है कि फिलहाल बाजार में “कंफ्यूजन” बढ़ रहा है। उनके मुताबिक हालिया तेजी मुख्य रूप से शॉर्ट कवरिंग की वजह से आई है, क्योंकि बाजार में पहले काफी ज्यादा निराशा बन गई थी। इसलिए यह तेजी फिलहाल स्थायी बुल रन जैसी नहीं दिखती। उनका कहना है कि भारतीय बाजार की तुलना अमेरिकी बाजार से नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि अमेरिका में इस समय एआई आधारित रैली चल रही है, जबकि भारत में ऐसी कोई थीम मौजूद नहीं है।
शोमेश कुमार ने वैश्विक तनाव और पश्चिम एशिया की स्थिति को भी बाजार के लिए बड़ा फैक्टर बताया। उनका मानना है कि सैन्य टकराव धीरे-धीे कम हो सकता है, लेकिन “इकोनॉमिक वॉर” अभी जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि लंबे युद्ध का असर अमेरिका पर भी दिखाई देने लगा है और हथियारों के भंडार पर दबाव की खबरें सामने आ रही हैं। उनका मानना है कि दुनिया अब धीरे-धीरे “राइज ऑफ एशिया” और “फॉल ऑफ यूएस” की दिशा में बढ़ रही है, हालांकि इसका असर आने वाले कुछ वर्षों में स्पष्ट होगा। फिलहाल बाजार यह मानकर चल रहा है कि हालात पूरी तरह बेकाबू नहीं होंगे और आर्थिक नुकसान को सीमित रखने की कोशिश की जाएगी।
भारतीय बाजार को लेकर उनका आकलन है कि निफ्टी में 22,000 के आसपास मजबूत बॉटम बन चुका है। हालांकि बाजार फिलहाल “रन अवे रैली” नहीं देगा। जून तिमाही के नतीजों से बहुत बड़ी तेजी की उम्मीद नहीं है, जबकि सितंबर तिमाही से स्थिति बेहतर हो सकती है। उनके अनुसार निफ्टी 25,000 के आसपास ऊपर-नीचे घूम सकता है और आने वाले महीनों में कंसोलिडेशन का दौर देखने को मिल सकता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि हालिया तेजी के दौरान बने गैप्स भविष्य में भर सकते हैं, इसलिए निवेशकों को अत्यधिक उत्साह में खरीदारी नहीं करनी चाहिए।
इकोनॉमिक वॉर का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है, खासकर ऊर्जा क्षेत्र के जरिए। भारत की बड़ी निर्भरता आयातित ऊर्जा पर है, इसलिए तेल और गैस की अनिश्चितता का असर ग्रोथ पर पड़ना तय है। शोमेश कुमार का मानना है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ अब 7% से ऊपर जाने के बजाय करीब 6.5% के आसपास रह सकती है। उन्होंने खास तौर पर एमएसएमई सेक्टर में दबाव की बात कही और माना कि इसका असर अगले दो क्वार्टर में ज्यादा साफ दिखाई देगा।
निवेश रणनीति पर उन्होंने कहा कि फिलहाल पोर्टफोलियो को अधिक “डोमेस्टिक फोकस्ड” रखना चाहिए। विदेशी या ग्लोबल थीम पर निर्भरता कम रखने की सलाह दी गई। बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर को लेकर भी उन्होंने सावधानी बरतने को कहा, क्योंकि आर्थिक दबाव बढ़ने पर एनपीए और क्रेडिट रिस्क में इजाफा हो सकता है। उनका सुझाव है कि सीधे कर्ज देने वाले बिजनेस मॉडल्स में निवेश का वजन कम किया जाए और इंश्योरेंस, रेटिंग तथा अन्य फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनियों पर ध्यान दिया जाए।
डिफेंसिव सेक्टर में उन्होंने फार्मा और हेल्थकेयर को मजबूत विकल्प बताया। हालांकि ऐसी फार्मा कंपनियों से बचने की सलाह दी गई जिनकी अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता हो या जिन्हें अमेरिकी रेगुलेटरी रिस्क का सामना करना पड़ सकता है। अस्पताल, डायग्नोस्टिक्स और मेडिसिन रिटेल जैसे क्षेत्रों को लंबी अवधि के लिए बेहतर माना गया। कंजम्प्शन सेक्टर में भी निवेश बनाए रखने की सलाह दी गई, लेकिन उन कंपनियों में सतर्क रहने को कहा गया जो एलपीजी और एलएनजी की लागत से सीधे प्रभावित होती हैं।
तकनीकी स्तरों की बात करें तो शोमेश कुमार ने 24,000 के स्तर को बेहद अहम बताया। उनका कहना है कि अगर निफ्टी 24,000 के नीचे बंद होता है, तो बाजार का मोमेंटम कमजोर पड़ सकता है और फिर 23,500-23,000 तक गिरावट की संभावना बढ़ जाएगी। वहीं ऊपर की तरफ 24,800 एक अहम रेजिस्टेंस माना गया है, क्योंकि यह पूरे गिरावट के 62% रिट्रेसमेंट के आसपास का स्तर है। उन्होंने 25,200 से 25,350 के क्षेत्र को भी मजबूत सप्लाई जोन बताया, जहां बाजार को रुकावट मिल सकती है।
कुल मिलाकर उनका निष्कर्ष यही है कि निवेशकों को अभी धैर्य और अनुशासन बनाए रखना चाहिए। बाजार में जल्दबाजी से बचना जरूरी है। अगर करेक्शन आता है तो अच्छी कंपनियों में चरणबद्ध तरीके से खरीदारी की जा सकती है। उनका मानना है कि अगले 2-3 वर्षों में भारतीय बाजार में अच्छा रिटर्न मिल सकता है, लेकिन फिलहाल उतार-चढ़ाव और अस्थिरता के लिए तैयार रहना होगा।
(शेयर मंथन, 28 अप्रैल 2026) (आप किसी भी शेयर, म्यूचुअल फंड, कमोडिटी आदि के बारे में जानकारों की सलाह पाना चाहते हैं, तो सवाल भेजने का तरीका बहुत आसान है! बस, हमारे व्हाट्सऐप्प नंबर +911147529834 पर अपने नाम और शहर के नाम के साथ अपना सवाल भेज दें।)